ghalib kii padh doon ik ghazal ya she'r kah doon meer ka | ग़ालिब की पढ़ दूँ इक ग़ज़ल या शे'र कह दूँ मीर का

  - Wasif Iqbal
ग़ालिबकीपढ़दूँइकग़ज़लयाशे'रकहदूँमीरका
महफ़िलतिरीआरास्ताहोदिलतोबहलेहीरका
मंज़िलसेइतनापासहैतूअबज़रामोहतातरह
रहज़नपहनबैठाहोयाँचोग़ाकिसीरहगीरका
छिपजाएख़ामीसारीअपनीवास्तेइसकेलिए
करतारहावोतोगिलाबसकातिब-ए-तक़दीरका
मैंचीख़करकहताहूँसचकोबसइसीउम्मीदसे
शायदअसरहोजाएइनपरकुछमिरीतक़रीरका
ज़िंदानमेंरहकरयेसमझारक़्सकरनेकेलिए
कितनाअहमहैटूटनाभीपाँवकीज़ंजीरका
मुझइल्मकेशैदाईकोइकहादिसेनेदीसबक़
ख़ामोशरहतेहैंक़लमजबशोरहोशमशीरका
'वासिफ़'ज़मानातबहीसमझादीदकेक़ाबिलउसे
जबख़ूँमुसव्विरकाबनाहैरंगउसतस्वीरका
  - Wasif Iqbal
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