ज़ाहिर नहीं निगाह से मस्तूर है अभी

  - Wasif Iqbal
ज़ाहिरनहींनिगाहसेमस्तूरहैअभी
मंज़िलमेंजानताहूँबहुतदूरहैअभी
कलहीकीतोहैबातकिगुमनामथायहाँ
काँटोंपेचलपड़ाहैतोमशहूरहैअभी
मजनूँकोसंगमाराशरारतमेंएकने
मक़बूलइसजहाँमेंयेदस्तूरहैअभी
लुट-लुटकेतेरेइश्क़मेंआबादयूँँहुआ
लबदरियाजैसेदिल्लीयेमामूरहैअभी
जिसनेभीवालिदैनकोबेघरकियाक़सम
बदहालबेसहारावोमजबूरहैअभी
हरबातकेख़िलाफ़थामस्नदसेक़ब्लवो
मस्नदकेसाथबातभीमंज़ूरहैअभी
करतामैंदोस्तोंकोफ़रामोशकिसतरह
'वासिफ़'तोदुश्मनोंकाभीमश्कूरहैअभी
  - Wasif Iqbal
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