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Vikram Sharma
ahl-e-duniya naya naya hooñ main
ahl-e-duniya naya naya hooñ main | अहल-ए-दुनिया नया नया हूँ मैं
- Vikram Sharma
अहल-ए-दुनिया
नया
नया
हूँ
मैं
मा'ज़रत
ख़्वाब
देखता
हूँ
मैं
है
परिंदों
से
ख़ामुशी
दरकार
पेड़
से
बात
कर
रहा
हूँ
मैं
उस
की
तस्वीर
है
घड़ी
के
पास
हर
घड़ी
वक़्त
देखता
हूँ
मैं
ख़ुद
से
करता
हूँ
मशवरा
लेकिन
बात
औरों
की
मानता
हूँ
मैं
इस
क़दर
तीरगी
का
क़ाइल
हूँ
धूप
को
धूप
कह
रहा
हूँ
मैं
वाक़िआ'
हूँ
अज़ल
से
पहले
का
कुन
से
पहले
उठी
सदा
हूँ
मैं
मुझ
को
चुप-ज़ात
समझा
जाता
है
इस
क़दर
तेज़
चीख़ता
हूँ
मैं
- Vikram Sharma
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
ख़ाक
करेंगे
Asad Akbarabadi
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उसे
यूँँ
चेहरा-चेहरा
ढूँढता
हूँ
वो
जैसे
रात-दिन
सड़कों
पे
होगा
Shariq Kaifi
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जब
तुझे
याद
कर
लिया
सुब्ह
महक
महक
उठी
जब
तेरा
ग़म
जगा
लिया
रात
मचल
मचल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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पैसा
कमाने
आते
हैं
सब
राजनीति
में
आता
नहीं
है
कोई
भी
खोने
के
वास्ते
छम्मो
का
मुजरा
सुनते
हैं
नेता
जो
रात
भर
संसद
भवन
में
आते
हैं
सोने
के
वास्ते
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Paplu Lucknawi
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रात
यूँँ
दिल
में
तिरी
खोई
हुई
याद
आई
जैसे
वीराने
में
चुपके
से
बहार
आ
जाए
Faiz Ahmad Faiz
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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सारी
रात
लगाकर
उसपर
नज़्म
लिखी
और
उसने
बस
अच्छा
लिखकर
भेजा
है
Zahid Bashir
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कल
चौदहवीं
की
रात
थी
शब
भर
रहा
चर्चा
तिरा
कुछ
ने
कहा
ये
चाँद
है
कुछ
ने
कहा
चेहरा
तिरा
Ibn E Insha
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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Read More
कौन
निकले
घर
से
बाहर
रात
में
सो
गए
हम
अपने
अंदर
रात
में
फिर
से
मिलने
आ
गईं
तन्हाइयाँ
क्यूँ
नहीं
खुलते
हैं
दफ़्तर
रात
में
हम
जुटा
लेते
हैं
बिस्तर
तो
मगर
रोज़
कम
पड़ती
है
चादर
रात
में
रोज़
ही
वो
एक
लड़की
सुब्ह
सी
जाती
है
हम
को
जगा
कर
रात
में
ख़्वाब
देखा
है
इसी
का
रात
भर
सोए
थे
जिस
को
भुला
कर
रात
में
ज़िंदगी
भर
की
कमाई
एक
रात
जो
मिली
ख़ुद
को
गँवा
कर
रात
में
साँप
दो
आते
हैं
हम
को
काटने
उस
की
यादें
और
ये
घर
रात
में
ज़िंदगी
की
रात
इक
दिन
ख़त्म
हो
ये
दु'आ
करते
हैं
अक्सर
रात
में
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Vikram Sharma
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एक
ख़ामोशी
ने
सदा
पाई
ढाई
हर्फ़ों
में
फिर
वो
हकलाई
चार
दीवार
चंद
छिपकलियाँ
हिज्र
की
रात
के
तमाशाई
डूबने
का
उसे
मलाल
नहीं
जिसने
देखी
नदी
की
रा'नाई
आख़िरी
ट्रेन
थी
तिरी
जानिब
जो
ग़लत
प्लेटफॉर्म
पर
आई
बारिशों
ने
हमें
उदास
किया
सील
दीवार
में
उतर
आई
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Vikram Sharma
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जब
भी
करती
थी
वो
नदी
बातें
करती
थी
सिर्फ़
प्यास
की
बातें
हम
कि
चेहरे
तो
भूल
जाते
हैं
याद
रह
जाती
हैं
कई
बातें
फूल
देखें
तो
याद
आती
हैं
आपकी
ख़ुशबुओं
भरी
बातें
बीती
बातों
पे
ऐसे
शे'र
कहो
शे'र
से
निकले
कुछ
नई
बातें
आपकी
चुप
तो
जानलेवा
हैं
मुझ
सेे
कहिए
भली
बुरी
बातें
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Vikram Sharma
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दश्त
में
यार
को
पुकारा
जाए
क़ैस
साहब
का
रूप
धारा
जाए
मुझको
डर
है
कि
पिंजरा
खुलने
पर
ये
परिंदा
कहीं
न
मारा
जाए
दिल
उसे
याद
कर
सदा
मत
दे
कौन
आता
है
जब
पुकारा
जाए
दिल
की
तस्वीर
अब
मुकम्मल
हो
उनकी
जानिब
से
तीर
मारा
जाए
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Vikram Sharma
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किस
काम
के
वो
फूल
जो
सबने
दिए
मुझे
बेहतर
है
तेरे
हाथ
का
ख़ंजर
लगे
मुझे
Vikram Sharma
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