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Vikram Sharma
kaun nikle ghar se baahar raat men
kaun nikle ghar se baahar raat men | कौन निकले घर से बाहर रात में
- Vikram Sharma
कौन
निकले
घर
से
बाहर
रात
में
सो
गए
हम
अपने
अंदर
रात
में
फिर
से
मिलने
आ
गईं
तन्हाइयाँ
क्यूँ
नहीं
खुलते
हैं
दफ़्तर
रात
में
हम
जुटा
लेते
हैं
बिस्तर
तो
मगर
रोज़
कम
पड़ती
है
चादर
रात
में
रोज़
ही
वो
एक
लड़की
सुब्ह
सी
जाती
है
हम
को
जगा
कर
रात
में
ख़्वाब
देखा
है
इसी
का
रात
भर
सोए
थे
जिस
को
भुला
कर
रात
में
ज़िंदगी
भर
की
कमाई
एक
रात
जो
मिली
ख़ुद
को
गँवा
कर
रात
में
साँप
दो
आते
हैं
हम
को
काटने
उस
की
यादें
और
ये
घर
रात
में
ज़िंदगी
की
रात
इक
दिन
ख़त्म
हो
ये
दु'आ
करते
हैं
अक्सर
रात
में
- Vikram Sharma
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'जौन'
दुनिया
की
चाकरी
कर
के
तूने
दिल
की
वो
नौकरी
क्या
की
Jaun Elia
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हम
मेहनतकश
इस
दुनिया
से
जब
अपना
हिस्सा
माँगेंगे
इक
बाग़
नहीं,
इक
खेत
नहीं,
हम
सारी
दुनिया
माँगेंगे
Faiz Ahmad Faiz
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मुझ
को
ख़्वाहिश
है
उसी
शान
की
दिवाली
की
लक्ष्मी
देश
में
उल्फ़त
की
शब-ओ-रोज़
रहे
देश
को
प्यार
से
मेहनत
से
सँवारें
मिल
कर
अहल-ए-भारत
के
दिलों
में
ये
'कँवल'
सोज़
रहे
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Kanval Dibaivi
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मज़दूर
भले
सारी
ही
उम्र
करे
मेहनत
बेटी
की
विदाई
लायक़
पैसे
नहीं
होते
Amaan Pathan
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ख़ूँ
पिला
कर
जो
शे'र
पाला
था
उस
ने
सर्कस
में
नौकरी
कर
ली
Fahmi Badayuni
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पत्थर
पहले
ख़ुद
को
पत्थर
करता
है
उसके
बाद
ही
कुछ
कारीगर
करता
है
Madan Mohan Danish
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होने
दो
चराग़ाँ
महलों
में
क्या
हम
को
अगर
दीवाली
है
मज़दूर
हैं
हम
मज़दूर
हैं
हम
मज़दूर
की
दुनिया
काली
है
Jameel Mazhari
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बी.ए
भी
पास
हों
मिले
बी-बी
भी
दिल-पसंद
मेहनत
की
है
वो
बात
ये
क़िस्मत
की
बात
है
Akbar Allahabadi
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मेहनत
तो
करता
हूँ
फिर
भी
घर
ख़ाली
है
बाबूजी
मिट्टी
के
कुछ
दीपक
ले
लो
दीवाली
है
बाबूजी
मिट्टी
बेच
रहा
हूँ
जिस
में
कोई
जाल
फ़रेब
नहीं
सोना
चाँदी
दूध
मिठाई
सब
जा'ली
है
बाबूजी
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Gyan Prakash Akul
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हर
चंद
कि
हैं
अदबार
में
हम
कहते
हैं
खुले
बाज़ार
में
हम
हैं
सब
से
बड़े
संसार
में
हम
मज़दूर
हैं
हम
मज़दूर
हैं
हम
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Asrar Ul Haq Majaz
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ग़म-ज़दा
दिल
पे
लतीफ़े
भी
नहीं
खुलते
हैं
तेज़
तूफ़ान
में
छाते
भी
नहीं
खुलते
हैं
दिल
की
जानिब
से
भी
आवाज़
नहीं
आती
है
हम
पे
दुनिया
के
इशारे
भी
नहीं
खुलते
हैं
इश्क़
में
वापसी
आसान
नहीं
होती
है
यहाँ
से
आगे
के
रस्ते
भी
नहीं
खुलते
हैं
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Vikram Sharma
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जो
भी
होना
था
हो
गया
छोड़ो
अब
मैं
चलता
हूँ
रास्ता
छोड़ो
अब
तो
दुनिया
भी
देख
ली
तुमने
अब
तो
ख़्वाबों
को
देखना
छोड़ो
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Vikram Sharma
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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सोचता
हूँ
कि
दिल-ए-ज़ार
का
मतलब
क्या
है
एक
हँसते
हुए
बीमार
का
मतलब
क्या
है
आप
कहते
हैं
कि
दीवार
गिरा
दी
जाए
आप
की
नज़रों
में
दीवार
का
मतलब
क्या
है
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Vikram Sharma
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मैं
तुझ
सेे
बात
करने
को
तिरे
किरदार
में
आकर
इधर
से
फ़ोन
करता
हूँ
उधर
से
बात
करता
हूँ
मैं
तेरे
साथ
तो
घर
में
बड़ा
ख़ामोश
रहता
था
नहीं
मौजूद
तू
घर
में
तो
घर
से
बात
करता
हूँ
ख़िज़ाँ
का
कोई
मंज़र
मेरे
अंदर
रक़्स
करता
है
कभी
जो
बन
में
गुल
से
या
समर
से
बात
करता
हूँ
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Vikram Sharma
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