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Vikram Sharma
jo bhi hona tha ho gaya chhodo
jo bhi hona tha ho gaya chhodo | जो भी होना था हो गया छोड़ो
- Vikram Sharma
जो
भी
होना
था
हो
गया
छोड़ो
अब
मैं
चलता
हूँ
रास्ता
छोड़ो
अब
तो
दुनिया
भी
देख
ली
तुमने
अब
तो
ख़्वाबों
को
देखना
छोड़ो
- Vikram Sharma
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कौन
सी
जा
है
जहाँ
जल्वा-ए-माशूक़
नहीं
शौक़-ए-दीदार
अगर
है
तो
नज़र
पैदा
कर
Ameer Minai
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जलता
नहीं
हूँ
आतिश-ए-रुख़सार
देख
कर
करता
हूँ
नाज़
ताक़त-ए-दीदार
देख
कर
Shaikh Sohail
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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इक
शख़्स
मेरे
घर
पे
नमाज़ों
में
है
लगा
जो
चाहता
है
देखना
अच्छाइयों
के
दिन
Aqib khan
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समुंदर
में
भी
सहरा
देखना
है
मुझे
महफ़िल
में
तन्हा
देख
लेना
Aqib khan
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ख़ुद
को
शीशा
कर
लिया
है
यार
मैंने
अब
तो
तेरा
देखना
बनता
है
मुझ
को
Neeraj Neer
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मैंने
बस
इतना
पूछा
था
क्या
देखते
हो
भला
मैंने
ये
कब
कहा
था
मुझे
देखना
छोड़
दो
Tajdeed Qaiser
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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मैं
तुझ
सेे
बात
करने
को
तिरे
किरदार
में
आकर
इधर
से
फ़ोन
करता
हूँ
उधर
से
बात
करता
हूँ
मैं
तेरे
साथ
तो
घर
में
बड़ा
ख़ामोश
रहता
था
नहीं
मौजूद
तू
घर
में
तो
घर
से
बात
करता
हूँ
ख़िज़ाँ
का
कोई
मंज़र
मेरे
अंदर
रक़्स
करता
है
कभी
जो
बन
में
गुल
से
या
समर
से
बात
करता
हूँ
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Vikram Sharma
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कौन
निकले
घर
से
बाहर
रात
में
सो
गए
हम
अपने
अंदर
रात
में
फिर
से
मिलने
आ
गईं
तन्हाइयाँ
क्यूँ
नहीं
खुलते
हैं
दफ़्तर
रात
में
हम
जुटा
लेते
हैं
बिस्तर
तो
मगर
रोज़
कम
पड़ती
है
चादर
रात
में
रोज़
ही
वो
एक
लड़की
सुब्ह
सी
जाती
है
हम
को
जगा
कर
रात
में
ख़्वाब
देखा
है
इसी
का
रात
भर
सोए
थे
जिस
को
भुला
कर
रात
में
ज़िंदगी
भर
की
कमाई
एक
रात
जो
मिली
ख़ुद
को
गँवा
कर
रात
में
साँप
दो
आते
हैं
हम
को
काटने
उस
की
यादें
और
ये
घर
रात
में
ज़िंदगी
की
रात
इक
दिन
ख़त्म
हो
ये
दु'आ
करते
हैं
अक्सर
रात
में
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Vikram Sharma
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कोई
शिकवा
न
ही
गिला
कोई
यूँँ
ही
इक
दिन
चला
गया
कोई
अब
फ़क़त
फैसले
सुनाता
है
पहले
करता
था
मशवरा
कोई
ख़त
में
बस
इतना
ही
लिखा
उसने
आपने
ख़त
नहीं
लिखा
कोई
ज़र्द
पत्ते
सा
गिर
रहा
हूँ
मैं
हो
रहा
है
कहीं
हरा
कोई
एक
दिन
मैंने
ली
किसी
की
जगह
आ
गया
अब
मिरी
जगह
कोई
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Vikram Sharma
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दश्त
में
यार
को
पुकारा
जाए
क़ैस
साहब
का
रूप
धारा
जाए
मुझको
डर
है
कि
पिंजरा
खुलने
पर
ये
परिंदा
कहीं
न
मारा
जाए
दिल
उसे
याद
कर
सदा
मत
दे
कौन
आता
है
जब
पुकारा
जाए
दिल
की
तस्वीर
अब
मुकम्मल
हो
उनकी
जानिब
से
तीर
मारा
जाए
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Vikram Sharma
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ग़म-ज़दा
दिल
पे
लतीफ़े
भी
नहीं
खुलते
हैं
तेज़
तूफ़ान
में
छाते
भी
नहीं
खुलते
हैं
दिल
की
जानिब
से
भी
आवाज़
नहीं
आती
है
हम
पे
दुनिया
के
इशारे
भी
नहीं
खुलते
हैं
इश्क़
में
वापसी
आसान
नहीं
होती
है
यहाँ
से
आगे
के
रस्ते
भी
नहीं
खुलते
हैं
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