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Vikram Sharma
koi shikwa na hi gilaa koi
koi shikwa na hi gilaa koi | कोई शिकवा न ही गिला कोई
- Vikram Sharma
कोई
शिकवा
न
ही
गिला
कोई
यूँँ
ही
इक
दिन
चला
गया
कोई
अब
फ़क़त
फैसले
सुनाता
है
पहले
करता
था
मशवरा
कोई
ख़त
में
बस
इतना
ही
लिखा
उसने
आपने
ख़त
नहीं
लिखा
कोई
ज़र्द
पत्ते
सा
गिर
रहा
हूँ
मैं
हो
रहा
है
कहीं
हरा
कोई
एक
दिन
मैंने
ली
किसी
की
जगह
आ
गया
अब
मिरी
जगह
कोई
- Vikram Sharma
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ज़िन्दगी,
यूँँ
भी
गुज़ारी
जा
रही
है
जैसे,
कोई
जंग
हारी
जा
रही
है
जिस
जगह
पहले
से
ज़ख़्मों
के
निशां
थे
फिर
वहीं
पे
चोट
मारी
जा
रही
है
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Azm Shakri
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बनाने
को
अमाँ
मैं
भी
बना
देता
हज़ारों,
पर
बहानों
से
कहीं
ज़्यादा
मुझे
मंज़िल
थी
ये
प्यारी
Sandeep dabral 'sendy'
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सीने
लगाऊँ
ग़ैर
को
तो
पूछता
है
दिल
किसकी
जगह
थी
और
ये
सीने
पे
कौन
है
Ankit Maurya
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मुझ
में
थोड़ी
सी
जगह
भी
नहीं
नफ़रत
के
लिए
मैं
तो
हर
वक़्त
मोहब्बत
से
भरा
रहता
हूँ
Mirza Athar Zia
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गिला
भी
तुझ
से
बहुत
है
मगर
मोहब्बत
भी
वो
बात
अपनी
जगह
है
ये
बात
अपनी
जगह
Basir Sultan Kazmi
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मैं
अकेला
ही
चला
था
जानिब-ए-मंज़िल
मगर
लोग
साथ
आते
गए
और
कारवाँ
बनता
गया
Majrooh Sultanpuri
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जगह
की
क़ैद
नहीं
थी
कोई
कहीं
बैठे
जहाँ
मक़ाम
हमारा
था
हम
वहीं
बैठे
अमीर-ए-शहर
के
आने
पे
उठना
पड़ता
है
लिहाज़ा
अगली
सफ़ों
में
कभी
नहीं
बैठे
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Mehshar Afridi
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सब
कर
लेना
लम्हे
ज़ाया'
मत
करना
ग़लत
जगह
पर
जज़्बे
ज़ाया'
मत
करना
Ali Zaryoun
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चलते
हुए
मुझ
में
कहीं
ठहरा
हुआ
तू
है
रस्ता
नहीं
मंज़िल
नहीं
अच्छा
हुआ
तू
है
Abhishek shukla
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ये
आँसू
ढूँडता
है
तेरा
दामन
मुसाफ़िर
अपनी
मंज़िल
जानता
है
Asad Bhopali
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जिन
से
उठता
नहीं
कली
का
बोझ
उन
के
कंधों
पे
ज़िंदगी
का
बोझ
वक़्त
जब
हाथ
में
नहीं
रहता
किस
लिए
हाथ
पर
घड़ी
का
बोझ
ब्याह
के
वक़्त
की
कोई
फोटो
गहनों
के
बोझ
पर
हँसी
का
बोझ
सर
पे
यादों
की
टोकरी
रख
ली
कम
न
होने
दिया
कमी
का
बोझ
मिन्नतें
क्यूँ
करे
ख़ुदास
अब
आदमी
बाँटे
आदमी
का
बोझ
ज़ब्त
का
बाँध
टूट
जाने
दो
कम
करो
आँख
से
नमी
का
बोझ
हिज्र
था
एक
ही
घड़ी
का
पर
दिल
से
उतरा
न
उस
घड़ी
का
बोझ
हम
को
ऐसे
ख़ुदा
क़ुबूल
नहीं
जिन
से
उठता
नहीं
ख़ुदी
का
बोझ
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Vikram Sharma
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किस
काम
के
वो
फूल
जो
सबने
दिए
मुझे
बेहतर
है
तेरे
हाथ
का
ख़ंजर
लगे
मुझे
Vikram Sharma
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जिन
से
उठता
नहीं
कली
का
बोझ
उन
के
कंधों
पे
ज़िन्दगी
का
बोझ
वक़्त
जब
हाथ
में
नहीं
रहता
किस
लिए
हाथ
पर
घड़ी
का
बोझ
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Vikram Sharma
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अपने
हालात
पे
हैरत
नहीं
करूँँगा
मैं
किसी
आईने
की
सोहबत
नहीं
करूँँगा
मैं
आरज़ी
लोगों
को
दिल
में
जगह
तो
दे
दूँगा
दिल
से
तन्हाई
को
रुख़्सत
नहीं
करूँँगा
मैं
ख़ुद
पे
इल्ज़ाम
लगाऊँगा
तुम
सेे
झगड़े
में
और
फिर
ख़ुद
की
वज़ाहत
नहीं
करूँँगा
मैं
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Vikram Sharma
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एक
ख़ामोशी
ने
सदा
पाई
ढाई
हर्फ़ों
में
फिर
वो
हकलाई
चार
दीवार
चंद
छिपकलियाँ
हिज्र
की
रात
के
तमाशाई
डूबने
का
उसे
मलाल
नहीं
जिस
ने
देखी
नदी
की
रा'नाई
आख़िरी
ट्रेन
थी
तिरी
जानिब
जो
ग़लत
प्लेटफार्म
पर
आई
बारिशों
ने
हमें
उदास
किया
सील
दीवार
में
उतर
आई
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Vikram Sharma
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