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Vikram Sharma
ek khaamoshi ne sadaa paai
ek khaamoshi ne sadaa paai | एक ख़ामोशी ने सदा पाई
- Vikram Sharma
एक
ख़ामोशी
ने
सदा
पाई
ढाई
हर्फ़ों
में
फिर
वो
हकलाई
चार
दीवार
चंद
छिपकलियाँ
हिज्र
की
रात
के
तमाशाई
डूबने
का
उसे
मलाल
नहीं
जिस
ने
देखी
नदी
की
रा'नाई
आख़िरी
ट्रेन
थी
तिरी
जानिब
जो
ग़लत
प्लेटफार्म
पर
आई
बारिशों
ने
हमें
उदास
किया
सील
दीवार
में
उतर
आई
- Vikram Sharma
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गुलाब
टहनी
से
टूटा
ज़मीन
पर
न
गिरा
करिश्में
तेज़
हवा
के
समझ
से
बाहर
हैं
Shahryar
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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इसे
तो
वक़्त
की
आब-ओ-हवा
ही
ठीक
कर
देगी
मियाँ
नासूर
होते
ज़ख़्म
सहलाया
नहीं
करते
shaan manral
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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बोसा
जो
रुख़
का
देते
नहीं
लब
का
दीजिए
ये
है
मसल
कि
फूल
नहीं
पंखुड़ी
सही
Sheikh Ibrahim Zauq
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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अगरचे
इश्क़
में
मजनू
बड़े
बदनाम
होते
हैं
अगरचे
क़ैस
जैसे
आशिक़ों
के
नाम
होते
हैं
भटक
सकती
नहीं
जंगल
में
लैला
चाह
करके
भी
अजी
लैला
को
घर
में
दूसरे
भी
काम
होते
हैं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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जाने
किस
किस
का
ख़याल
आया
है
इस
समुंदर
में
उबाल
आया
है
एक
बच्चा
था
हवा
का
झोंका
साफ़
पानी
को
खंगाल
आया
है
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Dushyant Kumar
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रखते
हैं
मोबाइल
में
मोहब्बत
की
निशानी
अब
फूल
किताबों
में
छुपाया
नहीं
करते
Meharban Amrohvi
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ये
कैसे
सानिहे
अब
पेश
आने
लग
गए
हैं
तेरे
आग़ोश
में
हम
छटपटाने
लग
गए
हैं
बहुत
मुमकिन
है
कोई
तीर
हमको
आ
लगेगा
हम
ऐसे
लोग
जो
पंछी
उड़ाने
लग
गए
हैं
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Vikram Sharma
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दश्त
में
यार
को
पुकारा
जाए
क़ैस
साहब
का
रूप
धारा
जाए
मुझको
डर
है
कि
पिंजरा
खुलने
पर
ये
परिंदा
कहीं
न
मारा
जाए
दिल
उसे
याद
कर
सदा
मत
दे
कौन
आता
है
जब
पुकारा
जाए
दिल
की
तस्वीर
अब
मुकम्मल
हो
उनकी
जानिब
से
तीर
मारा
जाए
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Vikram Sharma
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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जो
भी
होना
था
हो
गया
छोड़ो
अब
मैं
चलता
हूँ
रास्ता
छोड़ो
अब
तो
दुनिया
भी
देख
ली
तुमने
अब
तो
ख़्वाबों
को
देखना
छोड़ो
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Vikram Sharma
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ग़म-ज़दा
दिल
पे
लतीफ़े
भी
नहीं
खुलते
हैं
तेज़
तूफ़ान
में
छाते
भी
नहीं
खुलते
हैं
दिल
की
जानिब
से
भी
आवाज़
नहीं
आती
है
हम
पे
दुनिया
के
इशारे
भी
नहीं
खुलते
हैं
इश्क़
में
वापसी
आसान
नहीं
होती
है
यहाँ
से
आगे
के
रस्ते
भी
नहीं
खुलते
हैं
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Vikram Sharma
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