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Vikas Rana
lo rakh dii jaan palde par
lo rakh dii jaan palde par | लो रख दी जान पलड़े पर
- Vikas Rana
लो
रख
दी
जान
पलड़े
पर
तुम
अपनी
शा'इरी
रक्खो
- Vikas Rana
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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वही
शागिर्द
फिर
हो
जाते
हैं
उस्ताद
ऐ
'जौहर'
जो
अपने
जान-ओ-दिल
से
ख़िदमत-ए-उस्ताद
करते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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न
खाओ
क़स
में
वग़ैरा
न
अश्क
ज़ाया'
करो
तुम्हें
पता
है
मेरी
जान
हक़-पज़ीर
हूँ
मैं
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Amaan Haider
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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ये
नहीं
है
कि
वो
एहसान
बहुत
करता
है
अपने
एहसान
का
एलान
बहुत
करता
है
आप
इस
बात
को
सच
ही
न
समझ
लीजिएगा
वो
मेरी
जान
मेरी
जान
बहुत
करता
है
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Jawwad Sheikh
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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राहों
में
जान
घर
में
चराग़ों
से
शान
है
दीपावली
से
आज
ज़मीन
आसमान
है
Obaid Azam Azmi
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क़ल्ब-ए-हज़ी
मता-ए-जाँ
यूँँ
शाद
कीजिए
कसरत
के
साथ
आप
हमें
याद
कीजिए
दौलत
में
चाहते
हो
इज़ाफा
अगर
शजर
तो
बेकसों
यतीमों
की
इमदाद
कीजिए
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Shajar Abbas
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तुम्हें
हुस्न
पर
दस्तरस
है
मोहब्बत
वोहब्बत
बड़ा
जानते
हो
तो
फिर
ये
बताओ
कि
तुम
उस
की
आँखों
के
बारे
में
क्या
जानते
हो
ये
जुग़राफ़िया
फ़ल्सफ़ा
साईकॉलोजी
साइंस
रियाज़ी
वग़ैरा
ये
सब
जानना
भी
अहम
है
मगर
उस
के
घर
का
पता
जानते
हो
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Tehzeeb Hafi
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बहुत
पहले
से
उन
क़दमों
की
आहट
जान
लेते
हैं
तुझे
ऐ
ज़िंदगी
हम
दूर
से
पहचान
लेते
हैं
Firaq Gorakhpuri
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तुम्हारे
बाद
के
बोसों
में
जानाँ
तुम्हारी
सांस
की
ख़ुशबू
नहीं
थी
Vikas Rana
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सोचना
भी
अजीब
आदत
है
ये
भी
तो
सोचने
की
सूरत
है
अब
मुझे
आप
छोड़
जाइएगा
अब
मुझे
आप
की
ज़रूरत
है
मेरी
सिगरेट
पे
ए'तिराज़
तो
हैं
क्या
मुझे
चूमने
की
हसरत
है
बस
अपने
आप
में
उलझा
हुआ
है
उसे
कह
दो
कि
शे'र
अच्छा
हुआ
है
समुंदर
की
चटाई
खींच
लो
अब
बहुत
दिन
से
यहीं
बैठा
हुआ
है
बुना
था
तुम
ने
पिछली
सर्दियों
में
ये
मैं
ने
हिज्र
जो
पहना
हुआ
है
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Vikas Rana
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मुझको
ये
मालूम
नहीं
था
तुम
सेे
मिलने
से
पहले
दोस्त
जल्दी
आँखें
भरने
वालों
के
मन
जल्दी
भर
जाते
हैं
Vikas Rana
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तेरे
पहलू
या
दरमियाँ
निकले
एक
जाँ
है
कहाँ
कहाँ
निकले
इस
तरह
से
कभी
समेट
मुझे
मेरे
खुलने
पर
इक
जहाँ
निकले
सोचता
हूँ
यूँँ
न
हो
इक
दिन
ये
ज़मीं
कोई
आसमाँ
निकले
आ
तिरी
साँस
साँस
पी
लूँ
मैं
जिस्म
से
रूह
का
धुआँ
निकले
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Vikas Rana
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कोई
लेगा
नहीं
बदला
हमारा
हमीं
को
क़त्ल
है
करना
हमारा
निछावर
जान
भी
है
उस
पे
करनी
अभी
तय
भी
नहीं
मरना
हमारा
हमारे
होंट
के
सहरा
तुम्हारे
तुम्हारी
आँख
का
दरिया
हमारा
अभी
इक
शे'र
कहना
रह
गया
है
अभी
निकला
नहीं
काँटा
हमारा
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Vikas Rana
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