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Usman Saifi
mujhe duniya ye ab paagal banaati hai
mujhe duniya ye ab paagal banaati hai | मुझे दुनिया ये अब पागल बनाती है
- Usman Saifi
मुझे
दुनिया
ये
अब
पागल
बनाती
है
मुझे
माँ
तू
बहुत
ही
याद
आती
है
दु'आ
जो
मेरे
हक़
में
की
थी
तूने
तब
मुझे
सबकी
नज़र
से
वो
बचाती
है
नहीं
है
कोई
भी
जो
मुझको
समझेगा
मुझे
माँ
ख़्वाब
में
आकर
बताती
है
हमेशा
हौसलों
को
दीं
उड़ानें
फिर
ये
क्यूँ
दुनिया
मज़ाक़
अब
भी
उड़ाती
है
- Usman Saifi
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तुम
से
छुट
कर
भी
तुम्हें
भूलना
आसान
न
था
तुम
को
ही
याद
किया
तुम
को
भुलाने
के
लिए
Nida Fazli
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जहाँ
पंखा
चल
रहा
है
वहीं
रस्सी
भी
पड़ी
है
मुझे
फिर
ख़याल
आया,
अभी
ज़िन्दगी
पड़ी
है
Zubair Ali Tabish
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गली
में
बैठे
हैं
उसकी
नज़र
जमाए
हुए
हमारे
बस
में
फ़क़त
इंतिज़ार
करना
है
Swapnil Tiwari
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उस
की
यादों
की
काई
पर
अब
तो
ज़िंदगी-भर
मुझे
फिसलना
है
Siraj Faisal Khan
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इतना
तो
याद
है
इक
वा'दा
किया
था
लेकिन
हम
ने
क्या
वा'दा
किया
था
हमें
ये
याद
नहीं
Bismil Dehlavi
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तेरे
यादों
की
छोटी
खिड़कियों
से
तुझे
हर
रोज़
जी
भर
देखता
हूँ
Umesh Maurya
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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गले
से
लगते
ही
जितने
गिले
थे
भूल
गए
वगर्ना
याद
थीं
हम
को
शिकायतें
क्या
क्या
Abdul Rahman Ehsaan Dehlavi
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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ख़याल
कब
से
छुपा
के
ये
मन
में
रक्खा
है
मिरा
क़रार
तुम्हारे
बदन
में
रक्खा
है
Siraj Faisal Khan
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ज़हर
है
कुछ
भरा
इतना
निगाहों
में
देखती
है
मुझे
जब
भी
रुलाती
है
जिस्म
को
मेरे
वो
कुछ
यूँँ
सताती
है
एक
नागिन
जो
मेरा
माँस
खाती
है
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Usman Saifi
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इस
उजड़े
हुए
घर
को
आबाद
तो
कर
ज़रा
सा
तू
इस
दिल
को
अब
शाद
तो
कर
मुहब्बत
में
अव्वल
तिरा
नाम
होगा
ज़रा
इस
परिंदे
को
आज़ाद
तो
कर
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Usman Saifi
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हम
इस
घर
को
कब
से
सँभाले
हुए
हैं
इसी
घर
से
तो
हम
निकाले
हुए
हैं
करी
जब
हिफ़ाज़त
तो
हमने
ये
देखा
हमारे
भी
हाथों
पे
छाले
हुए
हैं
दु'आ
उस
सेे
जब
भी
मिली
है
मुझे
तब
मिरी
ज़िंदगी
में
उजाले
हुए
हैं
नहीं
कोई
शिकवा
रहा
उलझनों
से
हम
अब
उलझनों
के
हवाले
हुए
हैं
ये
जो
डस
रहे
हैं
मुझे
आजकल
यूँँ
सभी
साँप
ये
मेरे
पाले
हुए
हैं
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Usman Saifi
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राह
में
तू
इश्क़
की
खोता
है
क्या
अब
बे-वफ़ा
के
धोखे
से
रोता
है
क्या
अब
ज़िन्दगी
में
हर-सू
ये
इक
शोर
क्यूँ
है
मरने
की
हालत
में
भी
सोता
है
क्या
अब
सब्ज़
होती
ही
नहीं
दिल
की
ज़मीं
भी
बीज
ख़्वाहिश
के
तू
ये
बोता
है
क्या
अब
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Usman Saifi
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गुलों
सा
खिल
गया
चेहरा
तो
आने
से
मगर
लब
सिल
गए
मेरे
तो
जाने
से
नज़र
का
रोज़
सदक़ा
हम
उतारेंगे
कोई
मिल
जाए
ख़ाली
हाथ
उठाने
से
नहीं
है
यार
मेरा
फिर
भी
लगता
है
मिला
है
आज
देखो
सर
झुकाने
से
रहेगी
जान
जब
तक
जिस्म
में
यारों
कभी
भूलें
न
हम
रस्ते
भुलाने
से
सुनी
है
बात
उसने
जो
नहीं
है
वो
बढ़ी
है
बात
अब
उसके
बढ़ाने
से
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Usman Saifi
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