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Usman Saifi
zahar hai kuchh bhara itnaa nigaahon men
zahar hai kuchh bhara itnaa nigaahon men | ज़हर है कुछ भरा इतना निगाहों में
- Usman Saifi
ज़हर
है
कुछ
भरा
इतना
निगाहों
में
देखती
है
मुझे
जब
भी
रुलाती
है
जिस्म
को
मेरे
वो
कुछ
यूँँ
सताती
है
एक
नागिन
जो
मेरा
माँस
खाती
है
- Usman Saifi
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ये
इश्क़
आग
है
और
वो
बदन
शरारा
है
ये
सर्द
बर्फ़
सा
लड़का
पिघलने
वाला
है
Shadab Asghar
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कुछ
इस
सलीक़े
से
माथे
पे
उसने
होंट
रखे
बदन
को
छोड़
के
सारी
थकन
को
चूम
लिया
Harsh saxena
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बदन
का
ज़िक्र
बातिल
है
तो
आओ
बिना
सर
पैर
की
बातें
करेंगे
Fahmi Badayuni
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है
अब
भी
बिस्तर-ए-जाँ
पर
तिरे
बदन
की
शिकन
मैं
ख़ुद
ही
मिटने
लगा
हूँ
उसे
मिटाते
हुए
Azhar Iqbal
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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मेरे
जिस्म
से
वक़्त
ने
कपड़े
नोच
लिए
मंज़र
मंज़र
ख़ुद
मेरी
पोशाक
हुआ
Azm Shakri
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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उस
साँवले
से
जिस्म
को
देखा
ही
था
कि
बस
घुलने
लगे
ज़बाँ
पे
मज़े
चाकलेट
के
Shahid Kabir
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है
उस
बदन
की
लत
मुझे
सो
दूसरा
बदन
अच्छा
तो
लग
रहा
है
मेरे
काम
का
नहीं
Vishnu virat
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रंग-ओ-रस
की
हवस
और
बस
मसअला
दस्तरस
और
बस
यूँँ
बुनी
हैं
रगें
जिस्म
की
एक
नस
टस
से
मस
और
बस
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Ammar Iqbal
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बड़ी
मुश्किल
से
अपने
ज़ख़्म
टाले
थे
सभी
अरमान
इस
दिल
से
निकाले
थे
डसा
मुझको
उन्हीं
साँपों
ने
है
हरपल
जो
मैंने
आस्तीनों
में
ही
पाले
थे
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Usman Saifi
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मुझे
तो
उसकी
तीखी
नज़रों
को
सहना
नहीं
आता
मगर
उसको
बिना
देखे
मुझे
रहना
नहीं
आता
मिरी
वो
जान
है
कैसे
कहूँ
उसको
मैं
हाल-ए-दिल
मुझे
उस
से
मोहब्बत
तो
है
पर
कहना
नहीं
आता
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Usman Saifi
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हम
इस
घर
को
कब
से
सँभाले
हुए
हैं
इसी
घर
से
तो
हम
निकाले
हुए
हैं
करी
जब
हिफ़ाज़त
तो
हमने
ये
देखा
हमारे
भी
हाथों
पे
छाले
हुए
हैं
दु'आ
उस
सेे
जब
भी
मिली
है
मुझे
तब
मिरी
ज़िंदगी
में
उजाले
हुए
हैं
नहीं
कोई
शिकवा
रहा
उलझनों
से
हम
अब
उलझनों
के
हवाले
हुए
हैं
ये
जो
डस
रहे
हैं
मुझे
आजकल
यूँँ
सभी
साँप
ये
मेरे
पाले
हुए
हैं
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Usman Saifi
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मुझे
दुनिया
ये
अब
पागल
बनाती
है
मुझे
माँ
तू
बहुत
ही
याद
आती
है
दु'आ
जो
मेरे
हक़
में
की
थी
तूने
तब
मुझे
सबकी
नज़र
से
वो
बचाती
है
नहीं
है
कोई
भी
जो
मुझको
समझेगा
मुझे
माँ
ख़्वाब
में
आकर
बताती
है
हमेशा
हौसलों
को
दीं
उड़ानें
फिर
ये
क्यूँ
दुनिया
मज़ाक़
अब
भी
उड़ाती
है
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Usman Saifi
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कुछ
उधर
से
कुछ
इधर
से
भी
बहुत
तोड़ा
हमें
इस
मुसीबत
ने
भी
हर
इक
मोड़
पे
मोड़ा
हमें
चंद
सिक्कों
की
क़दर
इज़्ज़त
से
भी
ज़्यादा
हुई
रोटियाँ
जब
माँगी
तो
अपनों
ने
भी
छोड़ा
हमें
रोज़
उठते
रोज़
मरने
के
लिए
ऐ
ज़िंदगी
इस
गरीबी
ने
कहीं
का
भी
नहीं
छोड़ा
हमें
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Usman Saifi
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