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Umar Farhat
tujh ko takta rehta hooñ
tujh ko takta rehta hooñ | तुझ को तकता रहता हूँ
- Umar Farhat
तुझ
को
तकता
रहता
हूँ
मैं
भी
तेरे
जैसा
हूँ
वो
मिट्टी
हो
जाता
है
जिस
को
हाथ
लगाता
हूँ
मैं
मिट्टी
के
ख़्वाबों
से
इश्क़
बना
के
बैठा
हूँ
आप
को
छाँव
मुबारक
हो
मैं
तो
पेड़
उगाता
हूँ
मैं
काँच
का
छोटा
सा
घर
किस
के
लिए
बनाता
हूँ
कोई
मुझ
से
बात
करे
हर
इक
का
मुँह
तकता
हूँ
तुम
ही
तुम
तो
होते
हो
जब
मैं
ख़ुद
में
होता
हूँ
- Umar Farhat
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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हर
इक
सू
हैं
दर-ओ-दीवार
लेकिन
मुयस्सर
है
नहीं
घर-बार
लेकिन
Umrez Ali Haider
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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उस
को
रुख़्सत
तो
किया
था
मुझे
मालूम
न
था
सारा
घर
ले
गया
घर
छोड़
के
जाने
वाला
Nida Fazli
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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समझ
के
आग
लगाना
हमारे
घर
में
तुम
हमारे
घर
के
बराबर
तुम्हारा
भी
घर
है
Hafeez Banarasi
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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घर
में
झीने
रिश्ते
मैंने
लाखों
बार
उधड़ते
देखे
चुपके
चुपके
कर
देती
है
जाने
कब
तुरपाई
अम्मा
Aalok Shrivastav
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इश्क़
कहता
है
भटकते
रहिए
और
तुम
कहते
हो
घर
जाना
है
Madan Mohan Danish
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धूप
नायाब
हुई
जाती
है
छाँव
बे-ताब
हुई
जाती
है
पानी
दरिया
में
नहीं
है
लेकिन
बस्ती
ग़र्क़ाब
हुई
जाती
है
गिर
गई
ओस
बदन
पर
कैसी
रूह
सैराब
हुई
जाती
है
मैं
किसी
रात
का
सन्नाटा
हूँ
वो
कोई
ख़्वाब
हुई
जाती
है
बर्फ़
क्या
दूर
गिरी
है
'फ़रहत'
नद्दी
पायाब
हुई
जाती
है
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Umar Farhat
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जिस्म
सियाही
बनाऊँगा
तेरा
हर्फ़
सजाऊँगा
तू
बहता
पानी
बन
जा
मैं
मछली
बन
जाऊँगा
कल
मौसम
की
हथेली
पर
नाम
तिरा
खुदवाऊँगा
अपना
ग़ुबार
उड़ा
कर
मैं
कुछ
तस्वीर
बनाऊँगा
किसी
किवाड़
की
आड़
में
अब
तुझ
को
ला
के
छुपाऊँगा
तिरे
बदन
के
पानी
से
मैं
सूरज
चमकाऊँगा
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Umar Farhat
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सियह
चादर
में
लिपटा
है
फ़लक
से
चाँद
उतरा
है
नदी
में
डूबता
सूरज
कई
दिन
से
पिघलता
है
तुम्हारी
ज़ात
की
छत
पर
कोई
रस्सी
से
लटका
है
जगाओ
मत
उसे
'फ़रहत'
ये
उल्लू
शब
का
जागा
है
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Umar Farhat
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है
कोई
और
भी
जहान
में
क्या
मैं
नहीं
हूँ
तिरे
गुमान
में
क्या
तू
ने
फ़ितराक
साथ
तो
रखा
तीर
भी
है
तिरी
कमान
में
क्या
एक
साया
था
दिल
में
वो
भी
बुझा
रह
गया
है
अब
इस
मकान
में
क्या
ज़ेर-ए-साया
है
और
सभी
दुनिया
हम
नहीं
हैं
तिरी
अमान
में
क्या
कोई
भी
तुझ
से
बात
करता
नहीं
ज़हर
सा
है
तिरी
ज़बान
में
क्या
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Umar Farhat
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आसमाँ
से
उतरता
हुआ
एक
तारा
बुझाया
हुआ
आज
भी
रात
की
रानी
के
तन
से
है
नाग
लिपटा
हुआ
एक
पत्ता
किसी
शाख़
से
टूट
कर
आज
तन्हा
हुआ
काग़ज़ी
तन
है
उस
का
मगर
धूप
में
कब
से
झुलसा
हुआ
पहला
अक्षर
तिरे
नाम
का
रौशनी
से
है
लिक्खा
हुआ
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Umar Farhat
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