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Umar Farhat
dhoop naayaab hui jaati hai
dhoop naayaab hui jaati hai | धूप नायाब हुई जाती है
- Umar Farhat
धूप
नायाब
हुई
जाती
है
छाँव
बे-ताब
हुई
जाती
है
पानी
दरिया
में
नहीं
है
लेकिन
बस्ती
ग़र्क़ाब
हुई
जाती
है
गिर
गई
ओस
बदन
पर
कैसी
रूह
सैराब
हुई
जाती
है
मैं
किसी
रात
का
सन्नाटा
हूँ
वो
कोई
ख़्वाब
हुई
जाती
है
बर्फ़
क्या
दूर
गिरी
है
'फ़रहत'
नद्दी
पायाब
हुई
जाती
है
- Umar Farhat
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एक
दरिया
है
यहाँ
पर
दूर
तक
फैला
हुआ
आज
अपने
बाजुओं
को
देख
पतवारें
न
देख
Dushyant Kumar
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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अगर
जन्नत
मिला
करती
फ़क़त
सज्दों
के
बदले
में
तो
फिर
इबलीस
मुर्शिद
सब
सेे
पहले
जन्नती
होता
Shajar Abbas
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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आँख
भर
आई
किसी
से
जो
मुलाक़ात
हुई
ख़ुश्क
मौसम
था
मगर
टूट
के
बरसात
हुई
Manzar Bhopali
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तुम
मुझे
उतनी
ही
प्यारी
हो
मेरी
जाँ
जितना
प्यारा
है
कश्मीर
इस
देश
को
Alankrat Srivastava
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काश
जन्नत
हमें
मिले
ऐसी
हर
तरफ़
आशिक़ाना
मौसम
हो
Amaan Pathan
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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उल्टी
तस्वीर
पहन
कर
निकले
अपनी
तक़दीर
पहन
कर
निकले
उस
को
देखा
था
बहुत
आँखों
ने
ख़्वाब
ता'बीर
पहन
कर
निकले
फ़स्ल-ए-गुल
आ
गई
तो
पाँव
में
हम
भी
ज़ंजीर
पहन
कर
निकले
शे'र
हम
ने
भी
बहुत
लिख
डाले
कैसी
तश्हीर
पहन
कर
निकले
हर
तरफ़
अपनी
अलम-दारी
है
कैसे
ये
तीर
पहन
कर
निकले
साथ
देने
को
बहत्तर
का
'उमर'
हम
भी
शमशीर
पहन
कर
निकले
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Umar Farhat
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आसमाँ
से
उतरता
हुआ
एक
तारा
बुझाया
हुआ
आज
भी
रात
की
रानी
के
तन
से
है
नाग
लिपटा
हुआ
एक
पत्ता
किसी
शाख़
से
टूट
कर
आज
तन्हा
हुआ
काग़ज़ी
तन
है
उस
का
मगर
धूप
में
कब
से
झुलसा
हुआ
पहला
अक्षर
तिरे
नाम
का
रौशनी
से
है
लिक्खा
हुआ
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Umar Farhat
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जिस्म
सियाही
बनाऊँगा
तेरा
हर्फ़
सजाऊँगा
तू
बहता
पानी
बन
जा
मैं
मछली
बन
जाऊँगा
कल
मौसम
की
हथेली
पर
नाम
तिरा
खुदवाऊँगा
अपना
ग़ुबार
उड़ा
कर
मैं
कुछ
तस्वीर
बनाऊँगा
किसी
किवाड़
की
आड़
में
अब
तुझ
को
ला
के
छुपाऊँगा
तिरे
बदन
के
पानी
से
मैं
सूरज
चमकाऊँगा
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दीवार
फलाँग
कर
आया
सूरज
का
आधा
साया
नागिन
ने
पलट
पलट
कर
देर
तलक
मुझ
को
डराया
था
कोई
और
खंडर
में
जिस
ने
वो
चराग़
जलाया
कल
शब
पागल
हो
कर
वो
फिर
मेरे
तन
में
समाया
उस
के
तन
की
रेत
पे
क्या
मैं
ने
कुछ
ख़ाका
बनाया
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है
कोई
और
भी
जहान
में
क्या
मैं
नहीं
हूँ
तिरे
गुमान
में
क्या
तू
ने
फ़ितराक
साथ
तो
रखा
तीर
भी
है
तिरी
कमान
में
क्या
एक
साया
था
दिल
में
वो
भी
बुझा
रह
गया
है
अब
इस
मकान
में
क्या
ज़ेर-ए-साया
है
और
सभी
दुनिया
हम
नहीं
हैं
तिरी
अमान
में
क्या
कोई
भी
तुझ
से
बात
करता
नहीं
ज़हर
सा
है
तिरी
ज़बान
में
क्या
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Umar Farhat
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