ik anokhi rasm ko zinda rakha hai | इक अनोखी रस्म को ज़िंदा रखा है

  - Tahir Azeem
इकअनोखीरस्मकोज़िंदारखाहै
ख़ूनहीनेख़ूनकोपसपारखाहै
अबजुनून-ए-ख़ुद-नुमाईमेंतोहमने
वहशतोंकाइकदरीचावारखाहै
शहरकैसेअबहक़ीक़त-आश्नाहो
आगहीपरज़ातकापहरारखाहै
तीरगीकीक्याअजबतरकीबहैये
अबहवाकेदोशपरदीवारखाहै
तुमचराग़ोंकोबुझानेपरतुलेहो
हमनेसूरजकोभीअबअपनारखाहै
तुमहमारेख़ूनकीक़ीमतपूछो
इसमेंअपनेज़र्फ़काअर्सारखाहै
शहरकीइसभीड़मेंचलतोरहाहूँ
ज़ेहनमेंपरगाँवकानक़्शारखाहै
ये'अज़ीम'अपनाकमाल-ए-ज़र्फ़हैजो
दुश्मनोंकेऐबपरपर्दारखाहै
  - Tahir Azeem
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