manzilon ko nazar men rakha hai | मंज़िलों को नज़र में रक्खा है

  - Tabish Dehlvi
मंज़िलोंकोनज़रमेंरक्खाहै
जबक़दमरहगुज़रमेंरक्खाहै
इकहयूलाहैघरख़राबीका!
वर्नाक्याख़ाकघरमेंरक्खाहै
हमनेहुस्न-ए-हज़ार-शेवाको
जल्वाजल्वानज़रमेंरक्खाहै
चाहिएसिर्फ़हिम्मत-ए-परवाज़
बाग़तोबाल-ओ-परमेंरक्खाहै
हरम-ओ-दैरसेअलगहमने
अभीइकसज्दासरमेंरक्खाहै
मेरीहिम्मतनेअपनीमंज़िलका
फ़ासलारहगुज़रमेंरक्खाहै
रातदिनधूपछाँवकाआलम
क्यातमाशानज़रमेंरक्खाहै
  - Tabish Dehlvi
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