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Swapnil Tiwari
apna har tinka samete kis jagah par ja chhupe
apna har tinka samete kis jagah par ja chhupe | अपना हर तिनका समेटे किस जगह पर जा छुपे
- Swapnil Tiwari
अपना
हर
तिनका
समेटे
किस
जगह
पर
जा
छुपे
हम
तिरी
आवाज़
की
चिड़ियों
से
घबराते
हुए
- Swapnil Tiwari
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मंज़िल
मिली
तो
उसकी
कमी
हमको
खा
गई
सामान
रास्ते
में
जो
खोना
पड़ा
हमें
Abbas Qamar
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बनाने
को
अमाँ
मैं
भी
बना
देता
हज़ारों,
पर
बहानों
से
कहीं
ज़्यादा
मुझे
मंज़िल
थी
ये
प्यारी
Sandeep dabral 'sendy'
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सब
कर
लेना
लम्हे
ज़ाया'
मत
करना
ग़लत
जगह
पर
जज़्बे
ज़ाया'
मत
करना
Ali Zaryoun
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कटते
भी
चलो,
बढ़ते
भी
चलो,
बाज़ू
भी
बहुत
हैं,
सर
भी
बहुत
चलते
भी
चलो
कि
अब
डेरे
मंज़िल
ही
पे
डाले
जाएँगे
Faiz Ahmad Faiz
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ऐ
जज़्बा-ए-दिल
गर
मैं
चाहूँ
हर
चीज़
मुक़ाबिल
आ
जाए
मंज़िल
के
लिए
दो
गाम
चलूँ
और
सामने
मंज़िल
आ
जाए
Behzad Lakhnavi
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मुझ
में
थोड़ी
सी
जगह
भी
नहीं
नफ़रत
के
लिए
मैं
तो
हर
वक़्त
मोहब्बत
से
भरा
रहता
हूँ
Mirza Athar Zia
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल,
तो
जुस्तजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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सिर्फ़
उस
के
होंट
काग़ज़
पर
बना
देता
हूँ
मैं
ख़ुद
बना
लेती
है
होंटों
पर
हँसी
अपनी
जगह
Anwar Shaoor
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ये
दुनिया
है
यहाँ
कोई
जगह
ख़ाली
नहीं
रहती
किसी
के
आने-जाने
से
कभी
कुछ
कम
नहीं
होता
Bashir Badr
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मज़ाक़
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
ये
ज़िंदगी
जो
पुकारे
तो
शक
सा
होता
है
कहीं
अभी
तो
मुझे
ख़ुद-कुशी
नहीं
करनी
गुनाह-ए-इश्क़
रिहा
होते
ही
करेंगे
फिर
गवाह
बनना
नहीं
मुख़बिरी
नहीं
करनी
बड़े
ही
ग़ुस्से
में
ये
कह
के
उस
ने
वस्ल
किया
मुझे
तो
तुम
से
कोई
बात
ही
नहीं
करनी
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Swapnil Tiwari
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नदी
की
लय
पे
ख़ुद
को
गा
रहा
हूँ
मैं
गहरे
और
गहरे
जा
रहा
हूँ
चुरा
लो
चाँद
तुम
उस
सम्त
छुप
कर
मैं
शब
को
उस
तरफ़
रिजहा
रहा
हूँ
वो
सुर
में
सुर
मिलाना
चाहती
है
मैं
अपनी
धुन
बदलता
जा
रहा
हूँ
यही
मौक़ा
है
ख़ारिज
कर
दूँ
ख़ुद
को
मैं
अपने
आप
को
दोहरा
रहा
हूँ
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Swapnil Tiwari
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किसी
ने
भी
न
मेरी
ठीक
तर्जुमानी
की
धुआँ
धुआँ
है
फ़ज़ा
मेरी
हर
कहानी
की
चलो
निकालो
मिरे
पाँव
में
चुभा
तारा
ज़मीं
की
सत्ह
तुम्हीं
ने
तो
आसमानी
की
गुनाह-ए-इश्क़
किया
और
कोई
सज़ा
न
हुई
ज़रूर
तुम
ने
सुबूतों
से
छेड़ख़्वानी
की
तिरा
ख़याल
हुआ
कैनवस
पे
मेहमाँ
कल
तमाम
रंगों
ने
मिल
कर
के
मेज़बानी
की
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Swapnil Tiwari
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इतनी
काली
रात
है
घर
में
फ़र्क़
नहीं
आँख
और
मंज़र
में
ऐसी
लंबी
नींद
है
मेरी
कीड़े
पड़
गए
हैं
बिस्तर
में
आधी
रात
इक
ख़्वाब
ने
आकर
आग
लगा
दी
है
चादर
में
उसके
सारे
बंदे
मर
गए
अब
वो
ख़ुदा
है
अजायबघर
में
शाख़े-ख़ुदा
पे
हैं
पत्ते
इसके
आदमी
की
जड़
है
बंदर
में
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Swapnil Tiwari
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मिरे
घर
में
न
होगी
रौशनी
क्या
नहीं
आओगे
इस
जानिब
कभी
क्या
चहकती
बोलती
आँखों
में
चुप्पी
उन्हें
चुभने
लगी
मेरी
कमी
क्या
ख़ुद
उस
का
रंग
पीछा
कर
रहे
हैं
कहीं
देखी
है
ऐसी
सादगी
क्या
लिपटती
हैं
मिरे
पैरों
से
लहरें
मुझे
पहचानती
है
ये
नदी
क्या
मैं
इस
शब
से
तो
उकताया
हुआ
हूँ
सहर
दे
पाएगी
कुछ
ताज़गी
क्या
तिरी
आहट
की
धूप
आती
नहीं
है
समाअत
भी
मिरी
कुम्हला
गई
क्या
ख़मोशी
बर्फ़
सी
'आतिश'
जमी
थी
नज़र
की
आँच
से
वो
गल
गई
क्या
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Swapnil Tiwari
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