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Swapnil Tiwari
zameen dobaara bane aur KHuda ka naam na ho
zameen dobaara bane aur KHuda ka naam na ho | ज़मीं दुबारा बने और ख़ुदा का नाम न हो
- Swapnil Tiwari
ज़मीं
दुबारा
बने
और
ख़ुदा
का
नाम
न
हो
के
'कुन'
के
बाद
फिर
उस
से
दु'आ
सलाम
न
हो
भटकता
फिरता
हूँ
बेघर
जो
इन
दिनों
हर
शाम
ये
इक
उदास
परिंदे
का
इंतक़ाम
न
हो
ये
क्या
कि
एक
ज़रा
ख़ुद-कुशी
का
दिल
जो
करे
तो
घर
में
मौत
का
थोड़ा
भी
इंतेज़ाम
न
हो
- Swapnil Tiwari
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मौत
ने
सारी
रात
हमारी
नब्ज़
टटोली
ऐसा
मरने
का
माहौल
बनाया
हमने
घर
से
निकले
चौक
गए
फिर
पार्क
में
बैठे
तन्हाई
को
जगह-जगह
बिखराया
हमने
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Shariq Kaifi
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मैं
अपनी
मौत
से
ख़ल्वत
में
मिलना
चाहता
हूँ
सो
मेरी
नाव
में
बस
मैं
हूँ
नाख़ुदा
नहीं
है
Pallav Mishra
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ज़िंदगी
फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता
को
पा
सकती
नहीं
मौत
ही
आती
है
ये
मंज़िल
दिखाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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देखो
मौत
का
मौसम
आने
वाला
है
ज़िंदा
रहना
सब
सेे
बड़ी
लड़ाई
है
Shadab Asghar
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मौत
वो
है
जो
आए
सजदे
में
ज़िन्दगी
वो
जो
बंदगी
हो
जाए
क्या
कहूँ
आप
कितने
प्यारे
हैं
इतने
प्यारे
कि
प्यार
ही
हो
जाए
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Vikram Gaur Vairagi
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ऐ
ताइर-ए-लाहूती
उस
रिज़्क़
से
मौत
अच्छी
जिस
रिज़्क़
से
आती
हो
परवाज़
में
कोताही
Allama Iqbal
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जब
से
छेड़ा
है
मेरे
ज़ख़्मों
को
आ
रही
मौत
की
सदा
मुझको
Rachit Sonkar
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ज़िंदगी
दूर
ही
हमें
कर
दे
मौत
के
बाद
वस्ल
मुमकिन
है
Akash Panwar
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राम
के
हाथों
मौत
लिखी
थी
रावण
की
वरना
तो
बजरंगबली
ही
काफ़ी
थे
Sanskar 'Sanam'
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दिल
को
सुकून
रूह
को
आराम
आ
गया
मौत
आ
गई
कि
दोस्त
का
पैग़ाम
आ
गया
Jigar Moradabadi
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धूप
के
भीतर
छुप
कर
निकली
तारीकी
सायों
भर
निकली
रात
गिरी
थी
इक
गढ्ढे
में
शाम
का
हाथ
पकड़
कर
निकली
रोया
उस
से
मिल
कर
रोया
चाहत
भेस
बदल
कर
निकली
फूल
तो
फूलों
सा
होना
था
तितली
कैसी
पत्थर
निकली
सूत
हैं
घर
के
हर
कोने
में
मकड़ी
पूरी
बुन
कर
निकली
ताज़ा-दम
होने
को
उदासी
ले
कर
ग़म
का
शावर
निकली
जाँ
निकली
उस
के
पहलू
में
वो
ही
मेरा
मगहर
निकली
हिज्र
की
शब
से
घबराते
थे
यार
यही
शब
बेहतर
निकली
जब
भी
चोर
मिरे
घर
आए
एक
हँसी
ही
ज़ेवर
निकली
'आतिश'
कुंदन
रूह
मिली
है
उम्र
की
आग
में
जल
कर
निकली
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Swapnil Tiwari
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तुम
से
इक
दिन
कहीं
मिलेंगे
हम
ख़र्च
ख़ुद
को
तभी
करेंगे
हम
इश्क़!
तुझ
को
ख़बर
भी
है?
अब
के
तेरे
साहिल
से
जा
लगेंगे
हम
किस
ने
रस्ते
में
चाँद
रक्खा
है
उस
से
टकरा
के
गिर
पड़ेंगे
हम
आसमानों
में
घर
नहीं
होते
मर
गए
तो
कहाँ
रहेंगे
हम
धूप
निकली
है
तेरी
बातों
की
आज
छत
पर
पड़े
रहेंगे
हम
जो
भी
कहना
है
उस
को
कहना
है
उस
के
कहने
पे
क्या
कहेंगे
हम
रोक
लेंगे
मुझे
तिरे
आँसू
ऐसे
पानी
पे
क्या
चलेंगे
हम
वो
सुनेगी
जो
सुनना
चाहेगी
जो
भी
कहना
है
वो
कहेंगे
हम
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Swapnil Tiwari
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मज़ाक
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
Swapnil Tiwari
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अपने
ख़्वाबों
को
इक
दिन
सजाते
हुए
गिर
पड़े
चाँद
तारों
को
लाते
हुए
एक
पुल
पर
खड़ा
शाम
का
आफ़्ताब
सब
को
तकता
है
बस
आते
जाते
हुए
एक
पत्थर
मिरे
सर
पे
आ
कर
लगा
कुछ
फलों
को
शजर
से
गिराते
हुए
ऐ
ग़ज़ल
तेरी
महफ़िल
में
पाई
जगह
इक
ग़लीचा
बिछाते
उठाते
हुए
सुब्ह
इक
गीत
कानों
में
क्या
पड़
गया
कट
गया
दिन
वही
गुनगुनाते
हुए
ज़ात
से
अपनी
'आतिश'
था
ग़ाफ़िल
बहुत
जल
गया
ख़ुद
दिया
इक
जलाते
हुए
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Swapnil Tiwari
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अपना
हर
तिनका
समेटे
किस
जगह
पर
जा
छुपे
हम
तिरी
आवाज़
की
चिड़ियों
से
घबराते
हुए
Swapnil Tiwari
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