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Shiv
yaar dekho aur haathon ko hilaao
yaar dekho aur haathon ko hilaao | यार देखो और हाथों को हिलाओ
- Shiv
यार
देखो
और
हाथों
को
हिलाओ
हैफ़
कोई
रह
रहा
है
बादलों
में
- Shiv
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रहने
को
सदा
दहर
में
आता
नहीं
कोई
तुम
जैसे
गए
ऐसे
भी
जाता
नहीं
कोई
Kaifi Azmi
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प्यास
जहाँ
की
एक
बयाबाँ
तेरी
सख़ावत
शबनम
है
पी
के
उठा
जो
बज़्म
से
तेरी
और
भी
तिश्ना-काम
उठा
Ali Sardar Jafri
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उस
ने
फेंका
मुझ
पे
पत्थर
और
मैं
पानी
की
तरह
और
ऊँचा
और
ऊँचा
और
ऊँचा
हो
गया
Kunwar Bechain
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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हर
गीत
में
हर
बार
गाऊँगा
तुझे
अपनी
ग़ज़ल
में
गुनगुनाऊँगा
तुझे
तू
ईद
है
और
तू
ही
दीवाली
मेरी
मैं
हर
बरस
यूँँही
मनाऊँगा
तुझे
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Krishnakant Kabk
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तुम
ने
स्वेटर
बुना
था
मिरे
नाम
का
मैं
भी
लाया
था
कुछ
सर्दियाँ
जंगली
Shakeel Azmi
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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गले
में
उस
के
ख़ुदा
की
अजीब
बरकत
है
वो
बोलता
है
तो
इक
रौशनी
सी
होती
है
Bashir Badr
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इश्क़
हुआ
है
क्या
तुझ
को
भी
तेरा
जो
होगा
सो
होगा
shaan manral
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रखे
है
लज़्ज़त-ए-बोसा
से
मुझ
को
गर
महरूम
तो
अपने
तू
भी
न
होंटों
तलक
ज़बाँ
पहुँचा
Jurat Qalandar Bakhsh
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बर्तन
उदासी
के
सभी
जब
भर
गए
सब
चाहने
वाले
तेरे
फिर
घर
गए
ज़िंदान
से
कोई
बचा
था
ही
नहीं
कुछ
तौक़
से
बंधे
थे
जिनके
सर
गए
उसको
गले
से
ही
लगा
कर
हम
बचे
दिल
से
उसे
जो
भी
लगाए
मर
गए
उम्मीद
उन
सेे
थी
हमें
इस
बात
की
उनको
कभी
जाना
नहीं
था
पर
गए
वो
लोग
शेर-ओ-शाइरी
से
दूर
थे
बे-बहर
को
भी
जो
ग़ज़ल
कह
कर
गए
काँटा
बना
कर
वो
गई
है
फूल
को
'शिव'
चुभ
न
जाए
तोड़ने
तुम
गर
गए
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Shiv
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फिर
से
वही
जो
कुछ
रवानी
चाहिए
क्या
बात
है
की
शब
जलानी
चाहिए
लग
कर
गिरे
है
उसके
होंठों
से
सुनो
मुझको
वही
सो
रग
पुरानी
चाहिए
कोई
नई
बातें
नहीं
अब
यार
वो
इक
जिस्म
को
फिर
से
जवानी
चाहिए
मैं
जो
किसी
से
कह
नहीं
पा'ता
अदू
क्या
अब
दिवारों
से
छुपा'नी
चाहिए
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Shiv
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निकल
के
उसकी
आँखों
से
करेंगे
क्या
सभी
दरिया
की
आँखों
से
बहेंगे
हम
Shiv
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बेजान
चीजें
नाज़नीं
से
दूर
रख
मुतलक़
सभी
में
जाँ
बसा
के
क्या
मिला
Shiv
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हाथ
कस
कर
पकड़
रखा
था
और
फिर
हवा
ने
अलग
किया
हमको
Shiv
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