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shampa andaliib
meraa kirdaar poora ho chuka ab
meraa kirdaar poora ho chuka ab | मेरा किरदार पूरा हो चुका अब
- shampa andaliib
मेरा
किरदार
पूरा
हो
चुका
अब
कहानी
ख़त्म
होने
जा
रही
है
- shampa andaliib
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वो
भी
आख़िर
तिरी
ता'रीफ़
में
ही
ख़र्च
हुआ
मैं
ने
जो
वक़्त
निकाला
था
शिकायत
के
लिए
Azhar Nawaz
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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चाँद
सा
मिस्रा
अकेला
है
मिरे
काग़ज़
पर
छत
पे
आ
जाओ
मिरा
शे'र
मुकम्मल
कर
दो
Bashir Badr
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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सब
ख़्वाहिशें
पूरी
हों
'फ़राज़'
ऐसा
नहीं
है
जैसे
कई
अश'आर
मुकम्मल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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खटखटाने
की
कोई
ज़हमत
ही
आख़िर
क्यूँ
करे
इसलिए
भी
घर
का
दरवाज़ा
खुला
रखता
हूँ
मैं
Tousief Tabish
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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तिरी
आँखों
के
अंदर
देखती
हैं
मिरी
आँखें
समुंदर
देखती
हैं
यही
आँखें
जहाँ
वालों
को
देखें
यही
आँखें
कलंदर
देखती
हैं
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shampa andaliib
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मेरे
दिल
में
भी
घर
कर
गई
ख़ामोशी
उसने
भी
कुछ
यार
तवज्जोह
कम
कर
दी
shampa andaliib
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अपनी
आँखों
पे
बाँध
कर
पट्टी
तेरी
गलियों
में
रक़्स
करती
हूँ
shampa andaliib
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ग़ुबार-ए-ग़म
नज़र
से
छट
रहा
है
बहुत
दिन
बाद
आया
ईद
का
दिन
shampa andaliib
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हाल-ए-जिगर
हमारा
फ़क़त
जानते
हैं
हम
कहने
को
ग़म-गुसार
बहुत
आस
पास
हैं
shampa andaliib
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