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Shadan Ahsan Marehrvi
shauqe azaadi-e-hawas men kati
shauqe azaadi-e-hawas men kati | शौक़े आज़ादी-ए-हवस में कटी
- Shadan Ahsan Marehrvi
शौक़े
आज़ादी-ए-हवस
में
कटी
उम्र
जितनी
मेरी
क़फ़स
में
कटी
- Shadan Ahsan Marehrvi
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एक
दिन
देखने
को
आ
जाते
ये
हवस
उम्र
भर
नहीं
होती
Ibn E Insha
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बूढ़ी
बोझल
सूखी
आँखें
देख
रही
हैं
हैरत
से
कच्ची
उम्र
के
लड़कों
ने
कुछ
ऐसी
बातें
लिक्खी
हैं
Shadab Javed
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बड़ा
घाटे
का
सौदा
है
'सदा'
ये
साँस
लेना
भी
बढ़े
है
उम्र
ज्यूँँ-ज्यूँँ
ज़िंदगी
कम
होती
जाती
है
Sada Ambalvi
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उम्र
भर
साँप
से
शर्मिंदा
रहे
ये
सुन
कर
जब
से
इंसान
को
काटा
है
तो
फन
दुखता
है
Munawwar Rana
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तर्जुबा
था
सो
दु'आ
की
के
नुकसान
ना
हो
इश्क़
मजदूर
को
मजदूरी
के
दौरान
ना
हो
मैं
उसे
देख
ना
पाता
था
परेशानी
में
सो
दु'आ
करता
था
मर
जाए
परेशान
ना
हो
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Afkar Alvi
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बनाओ
ताजमहल
के
ब-जाए
ताश
महल
तमाम
उम्र
मुहब्बत
करो
गिराओ
बनाओ
Charagh Sharma
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उम्र
भर
जिसने
न
माँगा
हो
ख़ुदास
कुछ
भी
उस
ने
बस
तुम
से
मोहब्बत
की
दु'आ
माँगी
है
Shadab Asghar
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अब
तो
ख़ुद
अपने
ख़ून
ने
भी
साफ़
कह
दिया
मैं
आपका
रहूॅंगा
मगर
उम्र
भर
नहीं
Aalok Shrivastav
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आख़िर
को
हँस
पड़ेंगे
किसी
एक
बात
पर
रोना
तमाम
उम्र
का
बे-कार
जाएगा
Khursheed Rizvi
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कुछ
इस
तरह
से
गुज़ारी
है
ज़िन्दगी
जैसे
तमाम
उम्र
किसी
दूसरे
के
घर
में
रहा
Ahmad Faraz
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दश्त
दरिया
दिखाई
देता
है
आब
सहरा
दिखाई
देता
है
देखता
हूँ
जो
चाँद
को
तककर
तेरा
चेहरा
दिखाई
देता
है
अब
तो
हर
मोड़
तेरे
कूँचे
को
मुझ
को
जाता
दिखाई
देता
है
तुझ
को
देखा
न
तूर
पर
मैंने
सिर्फ़
मूसा
दिखाई
देता
है
तेरे
आगे
तो
अब
मुझे
जाना
चाँद
मैला
दिखाई
देता
है
हिज्र
में
ढल
के
तू
भी
तो
वाइज़
मेरे
जैसा
दिखाई
देता
है
दश्त
में
फिरते
ढ़ोकरें
खाता
सिर्फ़
राँझा
दिखाई
देता
है
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Shadan Ahsan Marehrvi
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चाँद
निकला
नज़र
न
तू
आया
किस
तरह
ईद
मैं
मनाऊँगा
Shadan Ahsan Marehrvi
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देख
तेरे
फ़िराक़
में
जाना
किस
तरह
कट
रहा
दिसम्बर
है
Shadan Ahsan Marehrvi
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शे'र
अच्छा
कोई
हुआ
ही
नहीं
ख़ास
कहने
को
कुछ
रहा
ही
नहीं
रूठ
कर
चेहरे
को
जो
फेर
लिया
एक
मिसरा
भी
फिर
हुआ
ही
नहीं
इस
तरह
से
जुदा
हुआ
मुझ
सेे
जैसे
मेरा
कभी
वो
था
ही
नहीं
ढ़ाई
अक्षर
की
बात
मैंने
लिखी
लफ्ज़
उसने
कोई
पढ़ा
ही
नहीं
तुम
बताते
रहे
बुतों
को
ख़ुदा
बुत
ये
कहते
रहे
ख़ुदा
ही
नहीं
राब्ता
जिस
सेे
तुमको
करना
था
शख़्स
वो
मुझ
में
अब
रहा
ही
नहीं
हैं
सुख़नवर
जहाँ
में
और
मगर
मीर
जैसा
कोई
हुआ
ही
नहीं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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मसअले
इश्क़
के
मैं
हल
कर
दूँ
जज़्बा-ए-दिल
में
जो
बदल
कर
दूँ
तेरी
रंगत
में
ढाल
कर
मिसरे
तुझ
सेे
मंसूब
इक
ग़ज़ल
कर
दूँ
वहशत-ए-हिज्र
है
मुझे
दरपेश
कैसे
मुमकिन
है
इसको
हल
कर
दूँ
शे'र
मंसूब
जो
न
हों
तुझ
सेे
उन
में
पैदा
कोई
ख़लल
कर
दूँ
वक़्त
से
जो
मिले
हसीं
लम्हें
नाम
तेरे
वो
सारे
पल
कर
दूँ
तू
जो
कह
दे
तो
फिर
तेरी
ख़ातिर
मैं
भी
तामीर
इक
महल
कर
दूँ
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Shadan Ahsan Marehrvi
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