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Shadab Javed
boodhi bojhal sookhi aañkhen dekh rahi hain hairat se
boodhi bojhal sookhi aañkhen dekh rahi hain hairat se | बूढ़ी बोझल सूखी आँखें देख रही हैं हैरत से
- Shadab Javed
बूढ़ी
बोझल
सूखी
आँखें
देख
रही
हैं
हैरत
से
कच्ची
उम्र
के
लड़कों
ने
कुछ
ऐसी
बातें
लिक्खी
हैं
- Shadab Javed
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जब
मसअले
न
हल
हो
सकें
बात-चीत
से
फिर
जंग
ही
लड़ो
कि
ज़माना
ख़राब
है
shaan manral
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तुम
मुख़ातिब
भी
हो
क़रीब
भी
हो
तुम
को
देखें
कि
तुम
से
बात
करें
Firaq Gorakhpuri
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बात
ये
है
कि
आदमी
शाइर
या
तो
होता
है
या
नहीं
होता
Mahboob Khizan
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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सोच
समझ
कर
देख
लिया
है
क्या
बोलूँ
तुझ
को
तो
हर
बात
बुरी
लग
जाती
है
Sohil Barelvi
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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जो
चुप-चाप
रहती
थी
दीवार
पर
वो
तस्वीर
बातें
बनाने
लगी
Adil Mansuri
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कू-ब-कू
फैल
गई
बात
शनासाई
की
उस
ने
ख़ुश्बू
की
तरह
मेरी
पज़ीराई
की
Parveen Shakir
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कुछ
बात
है
कि
हस्ती
मिटती
नहीं
हमारी
सदियों
रहा
है
दुश्मन
दौर-ए-ज़माँ
हमारा
Allama Iqbal
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बात
करते
हुए
बे-ख़याली
में
ज़ुल्फ़ें
खुली
छोड़
दी
हम
निहत्थों
पे
उसने
ये
कैसी
बलाएँ
खुली
छोड़
दी
साथ
जब
तक
रहे
एक
लम्हे
को
भी
रब्त
टूटा
नहीं
उसने
आँखें
अगर
बंद
कर
ली
तो
बाँहें
खुले
छोड़
दी
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Khurram Afaq
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कोई
बतलाए
उसकी
बात
हमें
वो
जो
कहता
था
कायनात
हमें
पहले
हम
रात
काट
लेते
थे
और
अब
काटती
है
रात
हमें
हम
ने
वो
बात
भी
समझ
ली
है
जो
समझनी
नहीं
थी
बात
हमें
वरना
हम
लाश
हैं
मुकम्मल
लाश
ज़िंदा
रखते
हैं
हादसात
हमें
औलिया
में
शुमार
होते
हम
रोक
लेती
हैं
ख़्वाहिशात
हमें
चाह
कर
इन
बदन-सलाखों
से
हम
पे
जाइज़
नहीं
नजात
हमें
हम
हैं
दीमक-ज़दा
दरख़्त
की
ख़ाक
काट
सकते
हैं
काग़ज़ात
हमें
ये
जो
ग़ज़लें
हमारी
हैं
शादाब
ले
न
डूबें
ये
काफ़िरात
हमें
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Shadab Javed
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अपनी
जागीर
माँग
बैठे
हैं
ख़्वाब
ता'बीर
माँग
बैठे
हैं
जिसका
मिलना
नहीं
मुक़द्दर
में
हम
वो
तक़दीर
माँग
बैठे
हैं
आधी
सिगरेट
भी
हम
नहीं
देते
आप
कश्मीर
माँग
बैठे
हैं
मेरे
अश'आर
पढ़ने
वाले
लोग
तेरी
तस्वीर
माँग
बैठे
हैं
आप
ने
साथ
ही
नहीं
माँगा
आप
ज़ंजीर
माँग
बैठे
हैं
मुझको
शादाब
आजकल
सब
ग़म
सूरत-ए-पीर
माँग
बैठे
हैं
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Shadab Javed
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तो
क्या
ऐसे
ही
रोना
आ
गया
था
?
नहीं
!!
वो..
याद
लहजा
आ
गया
था
उन्हें
आँसू
पिलाये
जा
रहे
हैं
जिन्हें
आँखों
से
पीना
आ
गया
था
मैं
अपनी
ख़्वाहिशों
को
मार
आया
ये
मेरे
ज़ेहन
में
क्या
आ
गया
था
लतीफ़ा
तो
पुराना
था
मुझे
बस
तेरे
हंसने
से
हंसना
आ
गया
था
तेरी
फ़ोटो
मसीहा
है
मसीहा
तेरी
फ़ोटो
से
जीना
आ
गया
था
ज़माना,
धर्म,
घर
वाले,
ख़ुद
हम-तुम
हमारे
बीच
क्या-
क्या
आ
गया
था
तो
क्या
शादाब
तुम
उसको
न
भाए
?
तुम्हें
तो
शे'र
कहना
आ
गया
था
!
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Shadab Javed
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ता'रीफ़
सुन
रहा
हूँ
बहुत
तेरे
हाथ
की
साक़ी
मेरे
लिए
भी
ज़रा
सी
निकाल
दे
Shadab Javed
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इक
मुहब्बत
की
मात
हो
गई
है
इक
दुल्हन
की
वफ़ात
हो
गई
है
अब
नहीं
डूबेगी
कोई
सोहनी
मेरी
दरिया
से
बात
हो
गई
है
दिल
!!
मुहब्बत
से
बाज़
आएगा
तेरी
इतनी
बिसात
हो
गई
है
एक
तस्वीर
क्या
हटाई
गई
मेरे
कमरे
में
रात
हो
गई
है
अब
मैं
शादाब
नाम
भर
का
हूॅं
ज़ात
बे
मअनी
ज़ात
हो
गई
है
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Shadab Javed
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