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Sandeep dabral 'sendy'
din bhar pankhon ki baatein karne waale
din bhar pankhon ki baatein karne waale | दिन भर पंखों की बातें करने वाले
- Sandeep dabral 'sendy'
दिन
भर
पंखों
की
बातें
करने
वाले
शब
भर
याँ
पंखों
से
बातें
करते
हैं
- Sandeep dabral 'sendy'
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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रात
बाक़ी
थी
जब
वो
बिछड़े
थे
कट
गई
उम्र
रात
बाक़ी
है
Khumar Barabankvi
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
कि
कल
से
वक़्त
निकालूँगा
ज़िन्दगी
के
लिए
Swapnil Tiwari
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बदन
लिए
तलाशता
फिरू
हूँ
रात
दिन
उसे
सुना
है
जान
भी
मेरी
कहीं
इसी
शहर
में
है
Bhaskar Shukla
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खिड़कियों
से
झाँकती
है
रौशनी
बत्तियाँ
जलती
हैं
घर
घर
रात
में
Mohammad Alvi
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
ख़ाक
करेंगे
Asad Akbarabadi
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हम
जिसको
सोचा
करते
थे
हर
दिन
रात
मियाँ
लेकिन
वो
तो
किसी
और
के
ही
ख़्वाबों
की
ही
शहजादी
निकली
Sandeep dabral 'sendy'
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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इक
रोज़
मैं
विदा
हो
जाऊँगा
इस
ज़हाँ
से
फिर
खोजते
फिरोगे
नभ
में
सितारों
के
बीच
Sandeep dabral 'sendy'
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सुब्ह
होने
में
ज़माने
लगते
हैं
हिज्र
में
जब
दर्द
खाने
लगते
हैं
ख़ून
कम
होने
लगे
मुफ़लिस
का
तब
जब
गगन
में
मेघ
छाने
लगते
हैं
जब
सितारे
होते
हैं
गर्दिश
में
तब
लोग
अपने
आज़माने
लगते
हैं
ग़ैर
से
उम्मीद
हम
क्या
ही
करें
दूर
जब
अपने
ही
जाने
लगते
हैं
साल
होते
पाँच
पूरे
जैसे
ही
दीन
उनको
याद
आने
लगते
हैं
दीन
बस्ती
में
सियासत-दाँ
चुनाव
आते
ही
तब
भिनभिनाने
लगते
हैं
डोर
जब
कमज़ोर
हो
कानून
की
चोर
भी
आँखें
दिखाने
लगते
हैं
जब
अचानक
छोड़
देती
साथ
माँ
बोझ
सब
बापू
के
शाने
लगते
हैं
मूँद
ले
आँखें
पिता
जब,
तब
यहाँ
घर
के
छोटू
भी
कमाने
लगते
हैं
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चराग़ों
से
सबा
की
तुम
रवानी
यार
मत
पूछो
तवायफ़
से
यहाँ
उसकी
जवानी
यार
मत
पूछो
मुलाज़िम
एक
सरकारी
मुहब्बत
ले
गया
याँ
सो
अलम
जानो
हमारा
और
कहानी
यार
मत
पूछो
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