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Saarthi Baidyanath
kehne ko jab baat zaroori hoti haius dam dil ki naamnjoori hoti hai
kehne ko jab baat zaroori hoti haius dam dil ki naamnjoori hoti hai | कहने को जब बात ज़रूरी होती है
- Saarthi Baidyanath
कहने
को
जब
बात
ज़रूरी
होती
है
उस
दम
दिल
की
नामंजूरी
होती
है
दिल
की
धरती
बंजर
है
जाने
कब
से
जाने
क्यूँँ
बरसात
अधूरी
होती
है
इक
दूजे
के
आँसू
पोंछ
नहीं
सकते
मजबूरी
आख़िर
मजबूरी
होती
है
- Saarthi Baidyanath
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आसमाँ
से
गरज
छेड़ती
है
हमें
एक
बारिश
में
भी
भीगे
थे
साथ
हम
Parul Singh "Noor"
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सर्द
झोंकों
से
भड़कते
हैं
बदन
में
शो'ले
जान
ले
लेगी
ये
बरसात
क़रीब
आ
जाओ
Sahir Ludhianvi
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देख
कैसे
धुल
गए
है
गिर्या-ओ-ज़ारी
के
बाद
आसमाँ
बारिश
के
बाद
और
मैं
अज़ादारी
के
बाद
इस
सेे
बढ़
कर
तो
तुझे
कोई
हुनर
आता
नहीं
सोचता
हूँ
क्या
करेगा
दिल
आज़ारी
के
बाद
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Abbas Tabish
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
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Abrar Kashif
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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कमरे
से
वो
बारिश
कैसे
देखेगी
कमरे
में
इक
खिड़की
भी
बनवानी
थी
Sarul
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ख़ुश्बू
की
बरसात
नहीं
कर
पाते
हैं
हम
ख़ुद
ही
शुरुआत
नहीं
कर
पाते
हैं
जिस
लड़की
की
बातें
करते
हैं
सब
सेे
उस
लड़की
से
बात
नहीं
कर
पाते
हैं
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Gyan Prakash Akul
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तुम्हारे
पास
आते
हैं
तो
साँसें
भीग
जाती
हैं
मोहब्बत
इतनी
मिलती
है
कि
आँखें
भीग
जाती
हैं
तबस्सुम
इत्र
जैसा
है
हँसी
बरसात
जैसी
है
वो
जब
भी
बात
करती
है
तो
बातें
भीग
जाती
हैं
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Aalok Shrivastav
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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जो
इन्तेज़ार
करना
जानता
है
वही
तो
प्यार
करना
जानता
है
Saarthi Baidyanath
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तेरी
फ़ितरत
चुम्बक
सी
है
मेरी
फ़ितरत
लोहे
सी
अब
समझा
क्यूँँ
तेरा
जादू
मेरे
ऊपर
चलता
है
Saarthi Baidyanath
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रात
दिन
आवारगी
होने
लगी
तुम
मिले
तो
शा'इरी
होने
लगी
Saarthi Baidyanath
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अजब
ही
दौर
था
ज़ालिम
ग़ज़ल
की
नब्ज़
चलती
थी
मेरी
पलकें
उठाने
से
तेरी
पलकें
झुकाने
से
Saarthi Baidyanath
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मेरी
तन्हाइयाँ
बेचैनियाँ
रब
की
वसीयत
हैं
वसीयत
में
मिली
दौलत
तो
ठुकराई
नहीं
जाती
Saarthi Baidyanath
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