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Parvez Shaikh
zulm aisa na mere saath karen
zulm aisa na mere saath karen | ज़ुल्म ऐसा न मेरे साथ करें
- Parvez Shaikh
ज़ुल्म
ऐसा
न
मेरे
साथ
करें
ज़िस्म
में
रूह
भी
न
बाक़ी
रहे
- Parvez Shaikh
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आप
कहते
थे
कि
रोने
से
न
बदलेंगे
नसीब
उम्र
भर
आप
की
इस
बात
ने
रोने
न
दिया
Sudarshan Fakir
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
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Santosh S Singh
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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ज़ुल्म
फिर
ज़ुल्म
है
बढ़ता
है
तो
मिट
जाता
है
ख़ून
फिर
ख़ून
है
टपकेगा
तो
जम
जाएगा
Sahir Ludhianvi
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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ये
मैंने
कब
कहा
कि
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
करे
अगर
वो
मुझ
से
ख़ुश
नहीं
है
तो
मुझे
जुदा
करे
मैं
उसके
साथ
जिस
तरह
गुज़ारता
हूँ
ज़िंदगी
उसे
तो
चाहिए
कि
मेरा
शुक्रिया
अदा
करे
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Tehzeeb Hafi
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कोई
भी
रोक
न
पाता,
गुज़र
गया
होता
मेरा
नसीब-ए-मोहब्बत
सँवर
गया
होता
न
आईं
होती
जो
बेग़म
मेरी
अयादत
को
मैं
अस्पताल
की
नर्सों
पर
मर
गया
होता
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Paplu Lucknawi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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तो
डर
रहे
हैं
आप
कहीं
हक़
न
माँग
ले
यानी
कि
सबको
खौफ़
है
औरत
के
नाम
से
Abhishar Geeta Shukla
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किसी
किसी
को
नसीब
हैं
ये
उदासियाँ
भी
किसी
को
ये
भी
बता
न
पाए
उदास
लड़के
Vikas Sahaj
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अलालत
में
हुआ
लिपटा
बदन
था
किसी
की
ग़म-गुसारी
की
हैं
हमने
Parvez Shaikh
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सब्र
कर
सब्र
की
घड़ी
है
अभी
इतनी
मुश्किल
से
जो
मिली
है
अभी
वक़्त
से
पहले
मौत
अच्छी
नहीं
ज़िंदगी
सामने
पड़ी
है
अभी
आँख
रंजूर
हो
गई
मेरी
उस
ने
जाने
की
ज़िद
गढ़ी
है
अभी
बाद
तेरे
कोई
नहीं
होगा
तू
मिरी
आख़िरी
ख़ुशी
है
अभी
तू
भी
'परवेज़'
को
समझ
न
सका
तंज़
तेरा
भी
लाज़मी
है
अभी
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Parvez Shaikh
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यार
तुम
दिल
दुखा
रही
हो
क्या
बोल
दो
दूर
जा
रही
हो
क्या
यूँँ
ख़मोशी
मुझे
दिखा
कर
तुम
ज़ुल्म
पर
ज़ुल्म
ढह
रही
हो
क्या
मेरी
ग़ुर्बत
को
जान
कर
जानाँ
जान
मुझ
से
छुड़ा
रही
हो
क्या
दिल
में
ख़्वाहिश
है
दोस्ती
की
मगर
दुश्मनी
तुम
निभा
रही
हो
क्या
रिज़्क़
अल्लाह
दे
रहा
है
हमें
बात
उस
की
भुला
रही
हो
क्या
क्या
है
'परवेज़'
की
ख़ता
ये
बता
बे-सबब
आज़मा
रही
हो
क्या
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Parvez Shaikh
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ईद
मेरी
ख़ुशी
से
तो
गुज़रे
तू
मिरे
घर
से
हो
के
तो
गुज़रे
मैं
ने
अब
चाँद
भी
नहीं
देखा
शब
तिरी
दीद
ही
पे
तो
गुज़रे
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Parvez Shaikh
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हाथ
आया
न
कुछ
मिरे
अब
तो
शा'इरी
से
गुज़ारा
कैसे
करूँँ
Parvez Shaikh
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