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Parvez Shaikh
yaar tum dil dukha rahi ho kya
yaar tum dil dukha rahi ho kya | यार तुम दिल दुखा रही हो क्या
- Parvez Shaikh
यार
तुम
दिल
दुखा
रही
हो
क्या
बोल
दो
दूर
जा
रही
हो
क्या
यूँँ
ख़मोशी
मुझे
दिखा
कर
तुम
ज़ुल्म
पर
ज़ुल्म
ढह
रही
हो
क्या
मेरी
ग़ुर्बत
को
जान
कर
जानाँ
जान
मुझ
से
छुड़ा
रही
हो
क्या
दिल
में
ख़्वाहिश
है
दोस्ती
की
मगर
दुश्मनी
तुम
निभा
रही
हो
क्या
रिज़्क़
अल्लाह
दे
रहा
है
हमें
बात
उस
की
भुला
रही
हो
क्या
क्या
है
'परवेज़'
की
ख़ता
ये
बता
बे-सबब
आज़मा
रही
हो
क्या
- Parvez Shaikh
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ये
मत
सोचना
अब
मुहब्बत
नहीं
है
उसे
बस
बताने
की
हिम्मत
नहीं
है
वफ़ा
माँगता
क्यूँ
फिरुँ
हर
किसी
से
मिरे
दिल
में
इतनी
भी
ग़ुर्बत
नहीं
है
तिरे
मन
में
जब
आए
तब
काम
करना
मुझे
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
है
मिरे
यार
कहते
हैं
'परवेज़'
मुझ
को
मुझे
माल-ओ-ज़र
की
ज़रूरत
नहीं
है
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बदल
वो
गुनाहों
का
पाएगा
अपने
जो
करता
नहीं
है
नदामत
कभी
भी
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ये
मिरी
ज़िंदगी
किसी
की
है
फ़िक्र
मत
कीजे
आप
ही
की
है
जो
ख़फ़ा
है
उसे
मनाना
है
इस
लिए
हम
ने
शा'इरी
की
है
जिन
को
माना
था
दिल-अज़ीज़
कभी
उन्हीं
अपनों
ने
दुश्मनी
की
है
ठोकरें
लाख
खाईं
हम
ने
मगर
सिर्फ़
इक
रब
की
बंदगी
की
है
उस
हसीना
के
बिन
जिऍं
कैसे
टूट
कर
जिस
से
दिल-लगी
की
है
इश्क़
कर
के
पता
चला
हम
को
हम
ने
जीते
जी
ख़ुद-कुशी
की
है
तुम
को
परवेज़
क्या
हुआ
है
आज
इक
हसीना
से
दोस्ती
की
है
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दिल
में
हैं
वो
जफ़ा
पे
नहीं
इश्क़
मेरा
हवा
पे
नहीं
इतना
मासूम
है
मेरा
दिल
बात
करता
वफ़ा
पे
नहीं
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क्या
कहूँ
कुछ
कहा
भी
नहीं
जाता
है
बिन
तिरे
अब
रहा
भी
नहीं
जाता
है
ज़ख़्म
ऐसा
के
मरहम
कोई
भी
नहीं
मुझ
से
ये
सब
सहा
भी
नहीं
जाता
है
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