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Parvez Shaikh
kya kahooñ kuchh kaha bhi nahin jaata hai
kya kahooñ kuchh kaha bhi nahin jaata hai | क्या कहूँ कुछ कहा भी नहीं जाता है
- Parvez Shaikh
क्या
कहूँ
कुछ
कहा
भी
नहीं
जाता
है
बिन
तिरे
अब
रहा
भी
नहीं
जाता
है
ज़ख़्म
ऐसा
के
मरहम
कोई
भी
नहीं
मुझ
से
ये
सब
सहा
भी
नहीं
जाता
है
- Parvez Shaikh
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यहीं
डूब
जाने
को
जी
चाहता
है
यूँँ
आँसू
बहाने
को
जी
चाहता
है
नहीं
है
जहाँ
में
हमारा
कोई
अब
हमें
मुस्कुराने
को
जी
चाहता
है
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हाथ
आया
न
कुछ
मिरे
अब
तो
शा'इरी
से
गुज़ारा
कैसे
करूँँ
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वो
ज़ालिम
ज़रा
कुछ
तो
खौफ़-ए-ख़ुदा
कर
कि
आ
सकती
हैं
अब
क़यामत
कभी
भी
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ये
सच
है
कि
हमने
मुहब्बत
नहीं
की
कभी
दिल
ने
इतनी
भी
ज़हमत
नहीं
की
मिला
ज़ख़्म
अपनो
से
हम
को
हमेशा
किसी
से
कभी
भी
अदावत
नहीं
की
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ये
मत
सोचना
अब
मुहब्बत
नहीं
है
उसे
बस
बताने
की
हिम्मत
नहीं
है
वफ़ा
माँगता
क्यूँ
फिरुँ
हर
किसी
से
मिरे
दिल
में
इतनी
भी
ग़ुर्बत
नहीं
है
तिरे
मन
में
जब
आए
तब
काम
करना
मुझे
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
है
मिरे
यार
कहते
हैं
'परवेज़'
मुझ
को
मुझे
माल-ओ-ज़र
की
ज़रूरत
नहीं
है
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Parvez Shaikh
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