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Parvez Shaikh
vo zalim zara kuchh to khof-e-khuda kar
vo zalim zara kuchh to khof-e-khuda kar | वो ज़ालिम ज़रा कुछ तो खौफ़-ए-ख़ुदा कर
- Parvez Shaikh
वो
ज़ालिम
ज़रा
कुछ
तो
खौफ़-ए-ख़ुदा
कर
कि
आ
सकती
हैं
अब
क़यामत
कभी
भी
- Parvez Shaikh
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मिली
ना
किसी
से
मुहब्बत
कभी
भी
पड़ी
ना
किसी
की
ज़रूरत
कभी
भी
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ये
मिरी
ज़िंदगी
किसी
की
है
फ़िक्र
मत
कीजे
आप
ही
की
है
जो
ख़फ़ा
है
उसे
मनाना
है
इस
लिए
हम
ने
शा'इरी
की
है
जिन
को
माना
था
दिल-अज़ीज़
कभी
उन्हीं
अपनों
ने
दुश्मनी
की
है
ठोकरें
लाख
खाईं
हम
ने
मगर
सिर्फ़
इक
रब
की
बंदगी
की
है
उस
हसीना
के
बिन
जिऍं
कैसे
टूट
कर
जिस
से
दिल-लगी
की
है
इश्क़
कर
के
पता
चला
हम
को
हम
ने
जीते
जी
ख़ुद-कुशी
की
है
तुम
को
परवेज़
क्या
हुआ
है
आज
इक
हसीना
से
दोस्ती
की
है
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Parvez Shaikh
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ग़मों
से
रिहा
होंगे
परवेज़
साहब
अगर
मिल
गई
कुछ
मसर्रत
कभी
भी
Parvez Shaikh
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ये
मत
सोचना
अब
मुहब्बत
नहीं
है
उसे
बस
बताने
की
हिम्मत
नहीं
है
वफ़ा
माँगता
क्यूँ
फिरुँ
हर
किसी
से
मिरे
दिल
में
इतनी
भी
ग़ुर्बत
नहीं
है
तिरे
मन
में
जब
आए
तब
काम
करना
मुझे
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
है
मिरे
यार
कहते
हैं
'परवेज़'
मुझ
को
मुझे
माल-ओ-ज़र
की
ज़रूरत
नहीं
है
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देखना
है
मेरी
वफ़ा
का
रंग
देख
ले
हाथ
पर
हिना
का
रंग
ये
तकब्बुर
ये
नाज़
नख़रों
से
तेरे
चेहरे
पे
हैं
अना
का
रंग
साँवला
चेहरा
नील-गूँ
आँखें
और
उस
पर
तेरी
अदा
का
रंग
नाज़
करती
हैं
जिस
पे
हूर-ओ-मलक
तुझ
पे
उतरा
है
वो
हया
का
रंग
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Parvez Shaikh
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