ghazal kahii hai hadees-e-gham-e-jahaan ki tarah | ग़ज़ल कही है हदीस-ए-ग़म-ए-जहाँ की तरह

  - Panna Lal Noor
ग़ज़लकहीहैहदीस-ए-ग़म-ए-जहाँकीतरह
सुनेंगेलोगइसेअपनीदास्ताँकीतरह
फ़रेबदेताहूँदुनियाकोइंकिसारीका
मैंअपनेआपमेंफैलाहूँआसमाँकीतरह
क़दमक़दमपेज़िया-बारियाँमआ'ज़-अल्लाह
येरहगुज़रहैकिफैलीहैकहकशाँकीतरह
येगुलतोगुलहैंचमनकोबेचदेंज़ालिम
जोरूपअपनाबनाएहैंबाग़बाँकीतरह
ज़रूरसाज़िश-ए-कलक-ए-अज़लथीकुछइसमें
पड़ाहूँएकतरफ़हर्फ़-ए-राएगाँकीतरह
कहाँथामेरानशेमनमैंसबसेपूछआया
किसीकाघरजलेमेरेआशियाँकीतरह
टटोललेनाज़राउनकीआस्तीनेंभी
जोतुमसेहाथमिलातेहैंराज़-दाँकीतरह
वोजिनकाराज़-ए-मोहब्बतथाबे-नियाज़हुए
हमउनकाराज़छुपाएहैंअपनीजाँकीतरह
कोईतोजानपेखेलेहैबनकेपरवाना
जलाकरेहैकोईशम्अ-ए-बे-ज़बाँकीतरह
मिलेतोक़ाफ़िलेसौसौशिकस्ता-पाथेहमीं
उठउठकेबैठगएगर्द-ए-कारवाँकीतरह
  - Panna Lal Noor
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