dair-o-kaaba ki azmat musallam magar | दैर-ओ-काबा की अज़्मत मुसल्लम मगर

  - Om Prakash Laghar
दैर-ओ-काबाकीअज़्मतमुसल्लममगर
मय-कदाभीख़ुदाहीकेघरसालगे
चाँदतारोंकीजोदेरहाहैख़बर
देखनेमेंतोवोबे-ख़बरसालगे
गुमरहीमेंभीदीवाना-ए-दिल-फ़िगार
मंज़िल-ए-होशकाराहबरसालगे
येजहाँरश्क-ए-जन्नतहैकिसकेलिए
औरकिसीकोयहीदर्द-ए-सरसालगे
झीलमेंअध-खिलेफूलपरचाँदनी
हमकोमंज़रयेतेरीनज़रसालगे
शम-ए-बज़्म-ए-अदबथावोकलतकमगर
आज'लाग़र'चराग़-ए-सहरसालगे
  - Om Prakash Laghar
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