subh ko shaam karta rehta hooñ | सुब्ह को शाम करता रहता हूँ

  - Kalim Akhtar
सुब्हकोशामकरतारहताहूँ
मुश्किलोंसेगुज़रतारहताहूँ
कुछकुछकामकरतारहताहूँ
ख़ुदपेइल्ज़ामधरतारहताहूँ
ख़ुश्कपत्तोंकीतरहसुब्ह-ओ-शाम
लम्हा-लम्हाबिखरतारहताहूँ
क़द्रकीसरज़मीनबंजरहै
मैंभीशादाबकरतारहताहूँ
ज़ख़्म-ए-दिलकाइलाजमुमकिनहो
नमक-ए-ग़मसेभरतारहताहूँ
लम्हे-लम्हेकालेलेमुझसेहिसाब
जीतारहताहूँमरतारहताहूँ
शायदउसकासुराग़मिलजाए
अपनेअंदरउतरतारहताहूँ
  - Kalim Akhtar
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