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Abdul Hamid Adam
phir aaj adam shaam se gamgeen hai tabeeyat
phir aaj adam shaam se gamgeen hai tabeeyat | फिर आज 'अदम' शाम से ग़मगीं है तबीअत
- Abdul Hamid Adam
फिर
आज
'अदम'
शाम
से
ग़मगीं
है
तबीअत
फिर
आज
सर-ए-शाम
मैं
कुछ
सोच
रहा
हूँ
- Abdul Hamid Adam
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शाम
को
जिस
वक़्त
ख़ाली
हाथ
घर
जाता
हूँ
मैं
मुस्कुरा
देते
हैं
बच्चे
और
मर
जाता
हूँ
मैं
Rajesh Reddy
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बुलाया
शाम
को
लेकिन
वहाँ
मैं
सुब्ह
जा
बैठा
सुना
था
देर
से
आना
उसे
अच्छा
नहीं
लगता
Krishnakant Kabk
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मुँह
पर
नक़ाब-ए-ज़र्द
हर
इक
ज़ुल्फ़
पर
गुलाल
होली
की
शाम
ही
तो
सहर
है
बसंत
की
Lala Madhav Ram Jauhar
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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जब
सर-ए-शाम
पजीराई-ए-फ़न
होती
है
शाहज़ादी
को
कनीज़ों
से
जलन
होती
है
ले
तो
आया
हूँ
तुझे
घेर
के
अपनी
जानिब
आगे
इंसान
की
अपनी
भी
लगन
होती
है
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Azhar Faragh
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शाम
थी
हिज्र
की
हाल
मत
पूछना
आँख
थकने
लगे
तो
जिगर
रो
पड़े
Piyush Mishra 'Aab'
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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अब
शहर
की
थकावट
बेचैन
कर
रही
है
अब
शाम
हो
गई
है
चल
माँ
से
बात
कर
लें
Akash Rajpoot
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एक
कश्ती
क्यूँ
अभी
लौटी
नहीं
क्यूँ
किनारे
शाम
से
ख़ामोश
हैं
Umesh Maurya
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जब
तिरे
नैन
मुस्कुराते
हैं
ज़ीस्त
के
रंज
भूल
जाते
हैं
क्यूँँ
शिकन
डालते
हो
माथे
पर
भूल
कर
आ
गए
हैं
जाते
हैं
कश्तियाँ
यूँँ
भी
डूब
जाती
हैं
नाख़ुदा
किस
लिए
डराते
हैं
इक
हसीं
आँख
के
इशारे
पर
क़ाफ़िले
राह
भूल
जाते
हैं
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Abdul Hamid Adam
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ऐ
ग़म-ए-ज़िंदगी
न
हो
नाराज़
मुझ
को
आदत
है
मुस्कुराने
की
Abdul Hamid Adam
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हँस
के
बोला
करो
बुलाया
करो
आप
का
घर
है
आया
जाया
करो
मुस्कुराहट
है
हुस्न
का
ज़ेवर
मुस्कुराना
न
भूल
जाया
करो
हद
से
बढ़
कर
हसीन
लगते
हो
झूटी
क़स्में
ज़रूर
खाया
करो
ताकि
दुनिया
की
दिलकशी
न
घटे
नित-नए
पैरहन
में
आया
करो
कितने
सादा-मिज़ाज
हो
तुम
'अदम'
उस
गली
में
बहुत
न
जाया
करो
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Abdul Hamid Adam
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कहते
हैं
उम्र-ए-रफ़्ता
कभी
लौटती
नहीं
जा
मय-कदे
से
मेरी
जवानी
उठा
के
ला
Abdul Hamid Adam
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दिल
अभी
पूरी
तरह
टूटा
नहीं
दोस्तों
की
मेहरबानी
चाहिए
Abdul Hamid Adam
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