bigadta zakhm-e-hunar aashkaara karna pada | बिगड़ता ज़ख़्म-ए-हुनर आश्कारा करना पड़ा

  - Kabeer Athar
बिगड़ताज़ख़्म-ए-हुनरआश्काराकरनापड़ा
हमेंभीदादकामरहमगवाराकरनापड़ा
बहुतहवसथीमुझेरिज़्क़-ए-शेरकीलेकिन
जोमिलरहाथाउसीपरगुज़ाराकरनापड़ा
खड़ीथीमेरेलिएआँसुओंकीबारिशमें
सोतेरीयादसेमिलनागवाराकरनापड़ा
मैंइससेकमपेज़मानामुरीदकरलेता
ख़याल-ए-इश्क़मेंजितनातुम्हाराकरनापड़ा
मिलाएकभीआँसूदुरून-ए-चश्ममुझे
सोमुँहछुपाकेदुखोंसेकिनाराकरनापड़ा
जोख़्वाबनींदसेभीछुपकेदेखताथामैं
किसीकीआँखसेउसकानज़ाराकरनापड़ा
निगाह-ए-यारनेकुछऐसेऐबढूँढ़लिए
तमामकार-ए-मोहब्बतदोबाराकरनापड़ा
अबउससफ़रकीसऊबतकाक्याकहेंजिसमें
क़दमक़दमपेहमेंइस्तिख़ाराकरनापड़ा
सँभालीजातीनहींरौशनीज़मींसे'कबीर'
सुपुर्द-ए-ख़ाकयेकैसासिताराकरनापड़ा
  - Kabeer Athar
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