kabhi firaq kabhi lazzat-e-visaal men rakh | कभी फ़िराक़ कभी लज़्ज़त-ए-विसाल में रख

  - Kabeer Athar
कभीफ़िराक़कभीलज़्ज़त-ए-विसालमेंरख
मुझए'तिदालसेआरीकोए'तिदालमेंरख
नचारहाहैमुझेउँगलियोंपेइश्क़तिरा
तमामउम्रइसीरक़्स-ए-बे-मिसालमेंरख
दुखीहोदिलतोउतरतीहैशाइ'रीमुझपर
तुझेग़ज़लकीक़समहैमुझेमलालमेंरख
तूचाहताहैअगरकार-ए-आफ़ताबकरूँँ
मिराउरूजमिरीसाअ'त-ए-ज़वालमेंरख
तिरेबग़ैरगुज़ारीहैज़िंदगीमैंने
तूइससितमकीतलाफ़ीभीमाह-ओ-सालमेंरख
तूदिलहैऔरधड़कनातिरीइबादतहै
सोख़ुदकोजिस्मसेबाहरभीतूधमालमेंरख
शिकमसेहोकेगुज़रतेहैंक़ौल-ओ-फ़े'लमिरे
मुझऐसेशख़्सकोनान-ओ-नमककेजालमेंरख
मिरेबदनकोभलेइससेआगलगजाए
चराग़-ए-हर्फ़मगरमेरेबालबालमेंरख
मैंइसअज़ाबकेनश्शेमेंमुब्तलाहूँ'कबीर'
पराईआगउठाकरमिरीसिफ़ालमेंरख
  - Kabeer Athar
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