shafaq jab phool kar rang-e-hina thii | शफ़क़ जब फूल कर रंग-ए-हिना थी

  - Jafar Sahni
शफ़क़जबफूलकररंग-ए-हिनाथी
औरहवाकेलबसिलेथे
एकबूढ़ापेड़बरगदका
खड़ागँगा-किनारे
दिल-गिरफ़्ता
ख़ुदसेमहव-ए-गुफ़्तुगूथा
''वोमिरीइकशाख़कापत्ता
मिरेहीजिस्मकाहिस्सा
गिरा
गिरकरसिताराहोगया
पानीकाप्याराहोगया
मुझसेकिनाराहोगया''
वहींसरगोशियोंमें
इकपतिंगा
गुनगुनायाकानमेंउसके
निराशातुममेंक्यूँँजागी
मिरेबाबा?
तुम्हारेअंगकेकितनेहीपत्ते
अबभीगुनगातेतुम्हाराहैं
सहारातुमबनोउनका
तुम्हारावोसहाराहैं
इकपत्तेकोरोबाबा!
  - Jafar Sahni
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