kitnii saza mili hai mujhe arz-e-haal par | कितनी सज़ा मिली है मुझे अर्ज़-ए-हाल पर

  - Jafar Baluch
कितनीसज़ामिलीहैमुझेअर्ज़-ए-हालपर
पहरेलगेहुएहैंमिरीबोल-चालपर
कहतेहैंलोगजोशिश-ए-फ़स्ल-ए-बहारहै
फूलोंकाजबमिज़ाजहोए'तिदालपर
तूअपनीसिसकियोंकोदबाअपनेअश्कपोंछ
दोस्तछोड़देतूमुझेमेरेहालपर
फिरआजइस्मतोंकीजबींहैअरक़अरक़
तोहमतलगीहैफिरकिसीमरियम-ख़िसालपर
महसूसबारहायेहुआहैकिज़िंदगी
इकबर्फ़कीडलीहैकफ़-ए-बर्शगालपर
  - Jafar Baluch
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