fenk yuñ patthar ki sathe-aab bhi bojhal na ho | फेंक यूँँ पत्थर कि सत्ह-ए-आब भी बोझल न हो

  - Iqbal Sajid
फेंकयूँँपत्थरकिसत्ह-ए-आबभीबोझलहो
नक़्शभीबनजाएऔरदरियामेंभीहलचलहो
खोलयूँँमुट्ठीकिइकजुगनूनिकलेहाथसे
आँखकोऐसेझपकलम्हाकोईओझलहो
हैसफ़रदरपेशतोपरछाईंकीउँगलीपकड़
राहमेंतन्हाईकेएहसाससेपागलहो
पहलीसीढ़ीपेक़दमरखआख़िरीसीढ़ीपेआँख
मंज़िलोंकीजुस्तुजूमेंराएगाँइकपलहो
ज़ेहनख़ालीहोगएहैंवक़्तकेएहसाससे
सामनेवोमसअलारखजिसकाकोईहलहो
सबकेहीसीनोंमेंहैफैलाहुआसाँसोंकाहब्स
कोईशहरऐसानहींजिसकीफ़ज़ाबोझलहो
लोगअक्सरअपनेचेहरेपरचढ़ालेतेहैंख़ोल
तूजिसेसोनासमझताहैकहींपीतलहो
जुस्तुजूउसपेड़कीक्यूँँहोकिजोसायादे
हाथउसडालीपेक्यापहुँचेकिजिसपरफलहो
रोज़-ओ-शबलगतारहेसोचोंकामेलाज़ेहनमें
शोरसेख़ालीकभीएहसासकाजंगलहो
गर्मकर'साजिद'लहूकोधीमीधीमीआँचसे
वक़्तसेपहलेतेरेजज़्बातमेंहलचलहो
  - Iqbal Sajid
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