ha | हमें अहल-ए-ज़माना ढूँडते हैं

  - Hafeez Shahid
हमेंअहल-ए-ज़मानाढूँडतेहैं
कोईताज़ानिशानाढूँडतेहैं
अभीतकहमकोईउन्वान-ए-ताज़ा
सर-ए-शहर-ए-फ़सानाढूँडतेहैं
हमारीहीतरहउठकरसवेरे
परिंदेआब-ओ-दानाढूँडतेहैं
ज़मींअबहोगईमस्कनपुराना
नयाकोईठिकानाढूँडतेहैं
चराग़-ए-ख़ून-ए-दिलहमतोजलाकर
मज़ामींकाख़ज़ानाढूँडतेहैं
मुसलमाँहोकेभीहमगुल-रुख़ोंमें
अदाएँकाफ़िरानाढूँडतेहैं
अभीकुछलोगऐसेहैंजो'शाहिद'
वहीपहलाज़मानाढूँडतेहैं
  - Hafeez Shahid
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