duniya ko roo-shanaas-e-haqeeqat na kar sake | दुनिया को रू-शनास-ए-हक़ीक़त न कर सके

  - Habeeb Ahmad Siddiqui
दुनियाकोरू-शनास-ए-हक़ीक़तकरसके
हमजितनाचाहतेथेमोहब्बतकरसके
सामान-ए-गुल-फ़रोशी-ए-राहतकरसके
राहतकोहमशरीक-ए-मोहब्बतकरसके
यूँँकसरत-ए-जमालनेलूटीमता-ए-दीद
तसकीन-ए-तिश्ना-कामी-ए-हैरतकरसके
अबइश्क़-ए-खाम-कारहीअरमाँकोदेजवाब
हमउनकोबे-क़रार-ए-मोहब्बतकरसके
बे-मेहरियोंसेकामरहागोतमाम-उम्र
बे-मेहरियोंकोसहनेकीआदतकरसके
कुछऐसीइल्तिफ़ात-नुमाथीनिगाह-ए-दोस्त
होतेरहेतबाहशिकायतकरसके
नाकामियाँतोफ़र्ज़अदाअपनाकरगईं
हमहैंकिए'तिराफ़-ए-हज़ीमतकरसके
फ़ख़्र-ए-मुनासिबतमेंतिरानामलेलिया
हमख़ुदहीपर्दा-ए-दारी-ए-उलफ़तकरसके
हर-चंदहाल-ए-दीदा-ओ-दिलहमकहाकिए
तशरीह-ए-कैफ़ियात-ए-मोहब्बतकरसके
अफ़्लाकपरतोहमनेबनाईंहज़ार-हा
ता'मीरकोईदहरमेंजन्नतकरसके
हमसेाएगी-ए-ज़ाहिद-ए-बद-ख़ूकेख़ौफ़से
परवरदिगारतेरीइबादतकरसके
  - Habeeb Ahmad Siddiqui
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