mujh ko dimaagh-e-shevan-o-aah-o-fughaan nahin | मुझ को दिमाग़-ए-शेवन-ओ-आह-ओ-फ़ुग़ाँ नहीं

  - Habeeb Ahmad Siddiqui
मुझकोदिमाग़-ए-शेवन-ओ-आह-ओ-फ़ुग़ाँनहीं
इकआतिश-ए-ख़मोशहूँजिसमेंधुआँनहीं
किससादगीसेकहतेहोहमराज़-दाँनहीं
वोकौनसाहैराज़जोतुमपरअयाँनहीं
वोदुश्मन-ए-सुकून-ए-दिल-ओ-जाँयहीहो
मा'सूमसीनिगाहकिजिसपरगुमाँनहीं
हैआगसीलगीहुईरगरगमेंक्याकहूँ
इकचश्म-ए-इन्तिज़ारहीयाँख़ूँ-चकाँनहीं
यूँँदेखताहूँबर्क़कोअल्लाहरेबे-दिली
जैसेकहींचमनमेंमिराआशियाँनहीं
इसचश्म-ए-नाज़कीकोईदेखेफ़ुसूँ-गरी
बार-ए-हयातभीमुझेअबतोगराँनहीं
मस्त-ए-नाज़मश्क़-ए-सितमइससेभीसिवा
ज़ौक़-ए-दर्दहैफ़अगरजावेदाँनहीं
दिलसर-ए-नियाज़कोक्याक़ैद-ए-संग-ओ-दर
का'बाहीक्याबुराहैजोवोआस्ताँनहीं
कीफ़ुर्सत-ए-हयाततिरीजुस्तुजूमेंसिर्फ़
वाएगरहनूज़-ए-वफ़ाकागुमाँनहीं
  - Habeeb Ahmad Siddiqui
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