gham-e-aashiqi se badh kar gham-e-zindagi nahin hai | ग़म-ए-आशिक़ी से बढ़ कर ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं है

  - Ghubar Kiratpuri
ग़म-ए-आशिक़ीसेबढ़करग़म-ए-ज़िंदगीनहींहै
मैंतिरेकरमकेक़ुर्बांमुझेकुछकमीनहींहै
मिरेजान-ओ-दिलकेमालिकमुझेबे-नियाज़-ए-ग़मकर
किसीऔरदरपेहरगिज़येजबींझुकीनहींहै
मिरेशहर-ए-जान-ओ-दिलमेंवोज़ियाबिखेरतेहैं
मिराक़ल्बहैमुजल्लायहाँतीरगीनहींहै
अमीर-ए-शहर-ए-शादाँमुझेअपनेपासरखना
तिरेदरसेदूररहकरकोईज़िंदगीनहींहै
वहीचारा-ए-वफ़ाहैजहाँदिलहोकार-फ़रमा
जहाँअक़्लहुक्मराँहोरह-ए-आशिक़ीनहींहै
येहैराज़-ए-इश्क़-ओ-उल्फ़तसमझसकेगावाइज़
जहाँतीरगीनहींहैवहाँरौशनीनहींहै
सुनीदुख-भरीकहानीमुझेबारयाबकरके
मिरेदिलमेंअबतमन्नाकोईदूसरीनहींहै
  - Ghubar Kiratpuri
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy