raat phir jaanib-e-sehr aayi | रात फिर जानिब-ए-सहर आई

  - Ghalib Ahmad
रातफिरजानिब-ए-सहरआई
कितनीदुश्वाररहगुज़रआई
चाँदतारोंकेफूलमुरझाए
जबभीशबनमकीआँखभरआई
हसरतोंकासफ़ेद-फ़ामकफ़न
कौनपहनेहुएकिधरआई
किसतमन्नाकीचश्म-ए-आवारा
ठोकरेंखाकेदर-ब-दरआई
आजरंग-ए-शफ़क़अजीबसाथा
दिलकीतस्वीरसीउतरआई
इकज़मानाहुआख़िज़ाँगुज़रे
दिलउजड़नेकीअबख़बरआई
क्याहुआदिलकीआबरूरही
ज़िंदगीकुछतोराहपरआई
  - Ghalib Ahmad
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