patte nahin kahii hari shaakh-e-shajar nahin | पत्ते नहीं कहीं हरी शाख़-ए-शजर नहीं

  - Ghalib Ahmad
पत्तेनहींकहींहरीशाख़-ए-शजरनहीं
इसशहरमेंबहारकीकोईख़बरनहीं
रंग-ए-ख़िज़ाँमेंलाखमिलाऊँदिलोंकेरंग
मौज-ए-शराब-ओ-शे'रमेंकोईअसरनहीं
डूबेपड़ेहैंक़ुल्ज़ुम-ए-ख़्वाब-ओ-ख़यालमें
मौज-ए-रवाँकहाँहैकिसीकोख़बरनहीं
दरियामेंमौजबनकेकहाँतकरहेकोई
मौज-ए-रवाँब-सूरत-ए-दीवार-ओ-दरनहीं
अबमंज़िल-ए-वजूदनहींदिलकीकाएनात
इसघरमेंएकमैंहूँकोईबामपरनहीं
तूराहत-ए-वजूदहैतूरूह-ए-काएनात
इसघरमेंतूनहींहैतोयेमेराघरनहीं
दश्त-ए-तलबहैख़त्मयहाँनाक़ा-ए-निगाह
येवोज़मींहैजिसमेंतुम्हारागुज़रनहीं
  - Ghalib Ahmad
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