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Gayatri Mehta
badalte pal men ham mehram nahin hain
badalte pal men ham mehram nahin hain | बदलते पल में हम महरम नहीं हैं
- Gayatri Mehta
बदलते
पल
में
हम
महरम
नहीं
हैं
तेरे
जैसे
तो
कम
से
कम
नहीं
हैं
मनाना
भी
तुम्हें
जी
जान
से
है
ख़फ़ा
करने
में
भी
हम
कम
नहीं
है
गुनाहों
को
तिरे
दे
दें
मुआ'फ़ी
ख़ुदा
है
वो
कि
देखो
हम
नहीं
हैं
लुटा
कर
तेरे
हिस्से
की
मोहब्बत
मेरी
आँखें
ज़रा
भी
नम
नहीं
हैं
मुझे
सीने
से
अपने
तुम
लगा
लो
जुदा
होने
के
ये
मौसम
नहीं
हैं
- Gayatri Mehta
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तेरी
रंजिश
खुली
तर्ज-ए-बयाँ
से
न
थी
दिल
में
तो
क्यूँँ
निकली
ज़बाँ
से
Dagh Dehlvi
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बोसा-ए-रुख़्सार
पर
तकरार
रहने
दीजिए
लीजिए
या
दीजिए
इंकार
रहने
दीजिए
Hafeez Jaunpuri
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ग़ुस्से
में
भींच
लेता
है
बाँहों
में
अपनी
वो
क्या
सोचना
है
फिर
उसे
ग़ुस्सा
दिलाइए
Pooja Bhatia
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ले
लो
बोसा
अपना
वापस
किस
लिए
तकरार
की
क्या
कोई
जागीर
हम
ने
छीन
ली
सरकार
की
Akbar Merathi
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जो
ग़ुस्सा
आ
गया
तो
क्या
ही
कर
लेंगे
ज़ुबाँ
ये
मेरी
गाली
भी
नहीं
देती
Irshad Siddique "Shibu"
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रदीफ़ो-क़ाफ़िया-ओ-बह'र
का
भी
इल्म
है
लाज़िम
फ़क़त
दिल
टूट
जाने
से
कोई
शाइर
नहीं
बनता
Avtar Singh Jasser
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मैं
एक
किरदार
से
बड़ा
तंग
हूँ
क़लमकार
मुझे
कहानी
में
डाल
ग़ुस्सा
निकालना
है
Umair Najmi
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रंजिश
ही
सही
दिल
ही
दुखाने
के
लिए
आ
आ
फिर
से
मुझे
छोड़
के
जाने
के
लिए
आ
Ahmad Faraz
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मेरी
बेचैनी
का
आलम
मेरी
बेचैनी
से
पूछो
मेरे
चहरे
से
पूछोगे
कहेगा
ठीक
है
सब
कुछ
Aqib khan
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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जिस्म
से
हो
के
पार
आए
हम
रूह
बिस्तर
पे
हार
आए
हम
ले
के
दिल
में
ग़ुबार
आए
हम
देख
पर्वरदिगार
आए
हम
उन
से
मिलने
की
बे-क़रारी
थी
मिल
के
भी
बे-क़रार
आए
हम
इक
भरोसा
दिलाने
की
ख़ातिर
शर्म
अपनी
उतार
आए
हम
आख़िरी
बार
मिल
के
आए
तो
उस
को
दिल
से
उतार
आए
हम
अब
के
हम
लौट
कर
कहाँ
जाएँ
घर
से
हो
के
फ़रार
आए
हम
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Gayatri Mehta
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थक
गए
सब
कहते
दीवाना
हमें
आप
ने
ही
देर
से
जाना
हमें
बात
चुभती
है
उसे
थोड़ी
मगर
ऐसे
ही
आता
है
समझाना
हमें
उस
ने
होंटों
से
पिलाई
देर
तक
आ
गया
है
रास
मय-ख़ाना
हमें
बाद
मुद्दत
के
मिला
वो
दिल
मकीं
हाए
पूछे
है
कि
पहचाना
हमें
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Gayatri Mehta
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फ़क़त
इस
बात
पे
दिल
रो
गया
है
जो
मेरा
था
नहीं
वो
खो
गया
है
हुई
हैरत
मुझे
इस
बात
की
वो
मिरी
बाँहों
में
कैसे
सो
गया
है
मैं
अब
उस
को
जगाऊँ
भी
तो
कैसे
जो
मुझ
से
लड़-झगड़
के
सो
गया
है
वो
अपनी
ज़िंदगी
के
पाप
सारे
समझ
के
मुझ
को
गंगा
धो
गया
है
अब
इस
में
फल
लगेंगे
नफ़रतों
के
वो
मुझ
में
बीज
ऐसा
बो
गया
है
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Gayatri Mehta
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जो
कुछ
मुझ
से
कमाया
जा
रहा
है
महज़
घर
का
किराया
जा
रहा
है
सुबूतों
को
मिटाया
जा
रहा
है
यूँँ
सच
का
क़द
घटाया
जा
रहा
है
वो
पत्थर
से
ज़ियादा
कुछ
नहीं
है
तो
फिर
सर
क्यूँ
झुकाया
जा
रहा
है
नहीं
निय्यत
मदद
की
हाथ
फिर
भी
बढ़ाने
को
बढ़ाया
जा
रहा
है
हक़ीक़त
हम
से
है
मुँह
फेर
बैठी
सो
ख़्वाबों
को
जगाया
जा
रहा
है
अलग
मैं
भीड़
से
चलने
लगी
हूँ
मुझे
पागल
बताया
जा
रहा
है
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तू
ने
कोशिश
तो
की
ज़माने
पर
लौ
बुझी
ही
नहीं
बुझाने
पर
मेरे
हाथों
का
देखने
जादू
घर
पे
आओ
कभी
तो
खाने
पर
लाश
ख़्वाबों
की
दफ़्न
कर
आए
दर्द
अब
जा
लगा
ठिकाने
पर
कोई
सीखे
नहीं
सिखाने
से
अक़्ल
आती
है
चोट
खाने
पर
नाम
उस
के
किए
हैं
दिन
भी
तो
क्यूँ
तमाशा
है
शब
बिताने
पर
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Gayatri Mehta
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