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Dagh Dehlvi
teri ranjish khulii tarj e bayaan sena thii dil men to kyun nikli zabaan se
teri ranjish khulii tarj e bayaan sena thii dil men to kyun nikli zabaan se | तेरी रंजिश खुली तर्ज-ए-बयाँ से
- Dagh Dehlvi
तेरी
रंजिश
खुली
तर्ज-ए-बयाँ
से
न
थी
दिल
में
तो
क्यूँँ
निकली
ज़बाँ
से
- Dagh Dehlvi
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सब
इंतज़ार
में
थे
कब
कोई
ज़बान
खुले
फिर
उसके
होंठ
खुले
और
सबके
कान
खुले
Umair Najmi
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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इन
हवाओं
में
ज़रा
सी
ख़ुशबू
हज़रत
घोलिए
थोड़ी
हिंदी
थोड़ी
सी
उर्दू
यहाँ
पर
बोलिए
Navneet krishna
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गले
मिली
कभी
उर्दू
जहाँ
पे
हिन्दी
से
मिरे
मिज़ाज
में
उस
अंजुमन
की
ख़ुशबू
है
Satish Shukla Raqeeb
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हिन्दी
महक
रही
है
लोबान
जैसी
मेरी
लहजे
को
मैं
ने
अपने
उर्दू
किया
हुआ
है
Prof. Rehman Musawwir
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हम
हैं
हिन्दी
और
हमारा
मुल्क
है
हिन्दोस्ताँ
हिन्द
में
पैदा
तसव्वुफ़
के
ज़बाँ-दाँ
कीजिए
Sahir Dehlavi
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मैं
हिंदी
और
उर्दू
को
अलग
कैसे
करूँँ
यारों
अगर
साँसें
हटा
दूँ
तो
बदन
में
कुछ
नहीं
बचता
Umesh Maurya
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ज़रा
नज़दीक
आकर
सुन
मेरी
इक
बात
ऐ
उर्दू
मेरी
तहरीर
बिन
तेरे
मुकम्मल
हो
नहीं
सकती
Avtar Singh Jasser
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फिर
चाहे
तो
न
आना
ओ
आन
बान
वाले
झूटा
ही
वअ'दा
कर
ले
सच्ची
ज़बान
वाले
Arzoo Lakhnavi
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उस
साँवले
से
जिस्म
को
देखा
ही
था
कि
बस
घुलने
लगे
ज़बाँ
पे
मज़े
चाकलेट
के
Shahid Kabir
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कहने
देती
नहीं
कुछ
मुँह
से
मोहब्बत
मेरी
लब
पे
रह
जाती
है
आ
आ
के
शिकायत
मेरी
Dagh Dehlvi
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आइना
देख
के
कहते
हैं
सँवरने
वाले
आज
बे-मौत
मरेंगे
मिरे
मरने
वाले
Dagh Dehlvi
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जली
हैं
धूप
में
शक्लें
जो
माहताब
की
थीं
खिंची
हैं
काँटों
पे
जो
पत्तियाँ
गुलाब
की
थीं
Dagh Dehlvi
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इस
नहीं
का
कोई
इलाज
नहीं
रोज़
कहते
हैं
आप
आज
नहीं
Dagh Dehlvi
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दिल
चुरा
कर
नज़र
चुराई
है
लुट
गए
लुट
गए
दुहाई
है
एक
दिन
मिल
के
फिर
नहीं
मिलते
किस
क़यामत
की
ये
जुदाई
है
ऐ
असर
कर
न
इंतिज़ार-ए-दुआ
माँगना
सख़्त
बे-हयाई
है
मैं
यहाँ
हूँ
वहाँ
है
दिल
मेरा
ना-रसाई
अजब
रसाई
है
इस
तरह
अहल-ए-नाज़
नाज़
करें
बंदगी
है
कि
ये
ख़ुदाई
है
पानी
पी
पी
के
तौबा
करता
हूँ
पारसाई
सी
पारसाई
है
वा'दा
करने
का
इख़्तियार
रहा
बात
करने
में
क्या
बुराई
है
कब
निकलता
है
अब
जिगर
से
तीर
ये
भी
क्या
तेरी
आशनाई
है
'दाग़'
उन
से
दिमाग़
करते
हैं
नहीं
मालूम
क्या
समाई
है
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Dagh Dehlvi
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