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Gayatri Mehta
jism se ho ke paar aa.e ham
jism se ho ke paar aa.e ham | जिस्म से हो के पार आए हम
- Gayatri Mehta
जिस्म
से
हो
के
पार
आए
हम
रूह
बिस्तर
पे
हार
आए
हम
ले
के
दिल
में
ग़ुबार
आए
हम
देख
पर्वरदिगार
आए
हम
उन
से
मिलने
की
बे-क़रारी
थी
मिल
के
भी
बे-क़रार
आए
हम
इक
भरोसा
दिलाने
की
ख़ातिर
शर्म
अपनी
उतार
आए
हम
आख़िरी
बार
मिल
के
आए
तो
उस
को
दिल
से
उतार
आए
हम
अब
के
हम
लौट
कर
कहाँ
जाएँ
घर
से
हो
के
फ़रार
आए
हम
- Gayatri Mehta
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हया
से
सर
झुका
लेना
अदास
मुस्कुरा
देना
हसीनों
को
भी
कितना
सहल
है
बिजली
गिरा
देना
Akbar Allahabadi
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हम
तो
उस
आँख
के
हैं
देखने
वाले,
देखो
जिस
में
शोख़ी
है
बहुत
और
हया
थोड़ी
सी
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Dagh Dehlvi
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अपने
जादू
पे
बहुत
नाज़
न
कर
जादूगर
कोई
जादू
हो
वो
बंगाल
में
कट
जाता
है
Usman Minai
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परतव
से
जिस
के
आलम-ए-इम्काँ
बहार
है
वो
नौ-बहार-ए-नाज़
अभी
रहगुज़र
में
है
Ali Sardar Jafri
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कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
Nadeem Shaad
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रुख़्सार
पर
है
रंग-ए-हया
का
फ़रोग़
आज
बोसे
का
नाम
मैं
ने
लिया
वो
निखर
गए
Hakim Mohammad Ajmal Khan Shaida
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लजा
कर
शर्म
खा
कर
मुस्कुरा
कर
दिया
बोसा
मगर
मुँह
को
बना
कर
Unknown
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जिसका
तारा
था
वो
आँखें
सो
गई
हैं
अब
कहाँ
करता
है
मुझ
पर
नाज़
कोई
Aalok Shrivastav
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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मुझे
भी
अपनी
क़िस्मत
पर
हमेशा
नाज़
रहता
है
सुना
है
ख़्वाहिशें
उनकी
भी
शर्मिंदा
नहीं
रहती
सुना
है
वो
भी
अब
तक
खाए
बैठी
हैं
कई
शौहर
बहुत
दिन
तक
मेरी
भी
बीवियाँ
ज़िंदा
नहीं
रहती
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Paplu Lucknawi
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तू
ने
कोशिश
तो
की
ज़माने
पर
लौ
बुझी
ही
नहीं
बुझाने
पर
मेरे
हाथों
का
देखने
जादू
घर
पे
आओ
कभी
तो
खाने
पर
लाश
ख़्वाबों
की
दफ़्न
कर
आए
दर्द
अब
जा
लगा
ठिकाने
पर
कोई
सीखे
नहीं
सिखाने
से
अक़्ल
आती
है
चोट
खाने
पर
नाम
उस
के
किए
हैं
दिन
भी
तो
क्यूँ
तमाशा
है
शब
बिताने
पर
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Gayatri Mehta
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बदलते
पल
में
हम
महरम
नहीं
हैं
तेरे
जैसे
तो
कम
से
कम
नहीं
हैं
मनाना
भी
तुम्हें
जी
जान
से
है
ख़फ़ा
करने
में
भी
हम
कम
नहीं
है
गुनाहों
को
तिरे
दे
दें
मुआ'फ़ी
ख़ुदा
है
वो
कि
देखो
हम
नहीं
हैं
लुटा
कर
तेरे
हिस्से
की
मोहब्बत
मेरी
आँखें
ज़रा
भी
नम
नहीं
हैं
मुझे
सीने
से
अपने
तुम
लगा
लो
जुदा
होने
के
ये
मौसम
नहीं
हैं
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Gayatri Mehta
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जो
कुछ
मुझ
से
कमाया
जा
रहा
है
महज़
घर
का
किराया
जा
रहा
है
सुबूतों
को
मिटाया
जा
रहा
है
यूँँ
सच
का
क़द
घटाया
जा
रहा
है
वो
पत्थर
से
ज़ियादा
कुछ
नहीं
है
तो
फिर
सर
क्यूँ
झुकाया
जा
रहा
है
नहीं
निय्यत
मदद
की
हाथ
फिर
भी
बढ़ाने
को
बढ़ाया
जा
रहा
है
हक़ीक़त
हम
से
है
मुँह
फेर
बैठी
सो
ख़्वाबों
को
जगाया
जा
रहा
है
अलग
मैं
भीड़
से
चलने
लगी
हूँ
मुझे
पागल
बताया
जा
रहा
है
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Gayatri Mehta
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थक
गए
सब
कहते
दीवाना
हमें
आप
ने
ही
देर
से
जाना
हमें
बात
चुभती
है
उसे
थोड़ी
मगर
ऐसे
ही
आता
है
समझाना
हमें
उस
ने
होंटों
से
पिलाई
देर
तक
आ
गया
है
रास
मय-ख़ाना
हमें
बाद
मुद्दत
के
मिला
वो
दिल
मकीं
हाए
पूछे
है
कि
पहचाना
हमें
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फ़क़त
इस
बात
पे
दिल
रो
गया
है
जो
मेरा
था
नहीं
वो
खो
गया
है
हुई
हैरत
मुझे
इस
बात
की
वो
मिरी
बाँहों
में
कैसे
सो
गया
है
मैं
अब
उस
को
जगाऊँ
भी
तो
कैसे
जो
मुझ
से
लड़-झगड़
के
सो
गया
है
वो
अपनी
ज़िंदगी
के
पाप
सारे
समझ
के
मुझ
को
गंगा
धो
गया
है
अब
इस
में
फल
लगेंगे
नफ़रतों
के
वो
मुझ
में
बीज
ऐसा
बो
गया
है
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Gayatri Mehta
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