bhang khaate hain na gaanja na chars peete hain | भंग खाते हैं न गाँजा न चरस पीते हैं

  - Faiz Khalilabadi
भंगखातेहैंगाँजाचरसपीतेहैं
हमवोभंवरेहैंजोएहसासकारसपीतेहैं
आपइसढंगसेअमृतभीनहींपीसकते
जिसहुनर-मंदीसेहमअश्क-ए-नफ़सपीतेहैं
सबयहींछोड़केजानाहैख़बरहैलेकिन
फिरयेहमकिसलिएदुनियाकीहवसपीतेहैं
जोतिरीयादकेकीड़ेहैंबदनकेअंदर
वोमिरीरूहकोखातेहैंप्लसपीतेहैं
तबकहींहोताहैइकशहदकाछत्तातय्यार
अन-गिनतफूलोंकाख़ूँजबयेमगसपीतेहैं
आपइकबूँदभीपीलेंतोग़शीजाए
ग़मकेआँसूजोअसीरान-ए-क़फ़सपीतेहैं
'फ़ैज़'कीफ़िक्रकीबोतलमेंहैजोज़हर-ए-सुख़न
देखनाहैकीअभीकितनेबरसपीतेहैं
  - Faiz Khalilabadi
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