din utarte hi nayi shaam pahan leta hooñ | दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ

  - Faiz Khalilabadi
दिनउतरतेहीनईशामपहनलेताहूँ
मैंतिरीयादोंकाएहरामपहनलेताहूँ
मेरेघरवालेभीतकलीफ़मेंजातेहैं
मैंजोकुछदेरकोआरामपहनलेताहूँ
रातकोओढ़केसोजाताहूँदिन-भरकीथकन
सुब्हकोफिरसेकईकामपहनलेताहूँ
जबभीपरदेसमेंयादआताहैघरकानक़्शा
मैंतसव्वुरमेंदर-ओ-बामपहनलेताहूँ
एकचाँदीकीअँगूठीकेहवालेसेफ़क़त
अपनीउँगलीमेंतिरानामपहनलेताहूँ
'फ़ैज़'यूँँरखताहूँमैंउसकीमोहब्बतकाभरम
उसकेहिस्सेकेभीइल्ज़ामपहनलेताहूँ
  - Faiz Khalilabadi
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