tamaam-duniya ka lakht-e-jigar banaa hua tha | तमाम-दुनिया का लख़्त-ए-जिगर बना हुआ था

  - Faiz Khalilabadi
तमाम-दुनियाकालख़्त-ए-जिगरबनाहुआथा
वोआदमीजोमिरादर्द-ए-सरबनाहुआथा
उसेतलाशरहीहैंमिरीउदासआँखें
जोख़्वाबरातकेपिछलेपहरबनाहुआथा
पहुँचकेकूचा-ए-जानाँमेंगयाबाहर
मिरेवजूदकेअंदरजोडरबनाहुआथा
कमाल-ए-इश्क़नेमेरेकियाहैज़ेरउसे
किसीकाहुस्नजोकलतकज़बरबनाहुआथा
उतरतीकैसेसुकूँकीवहाँकोईचिड़िया
महलजोहिर्सकीबुनियादपरबनाहुआथा
बनादियाउसेइंसानतेरीक़ुर्बतने
तिरेफ़िराक़मेंजोजानवरबनाहुआथा
येउसकाशौक़नहींउसकीइंकिसारीथी
वसीअ'होकेभीजोमुख़्तसरबनाहुआथा
पहुँचगयाहैजवानीसेअबबुढ़ापेतक
वोएकदुखजोशरीक-ए-सफ़रबनाहुआथा
हवसकेचाककीमिट्टीजवानथीजबतक
तमाम-शहरयहाँकूज़ा-गरबनाहुआथा
वोजानताथामिरेअन-कहेदुखोंकाइलाज
मगरवो'फ़ैज़'-मियाँबे-ख़बरबनाहुआथा
  - Faiz Khalilabadi
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