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Faheem Amrohvi
gham ki gar chaashni nahin hoti
gham ki gar chaashni nahin hoti | ग़म की गर चाशनी नहीं होती
- Faheem Amrohvi
ग़म
की
गर
चाशनी
नहीं
होती
ज़िंदगी
ज़िंदगी
नहीं
होती
रूठ
जाना
तो
ख़ैर
आसाँ
है
पर
मनाना
हँसी
नहीं
होती
उन
के
पीछे
तो
है
उन्हीं
का
ज़िक्र
सामने
बात
भी
नहीं
होती
दिल
लगा
कर
समझ
में
आया
है
ये
कोई
दिल-लगी
नहीं
होती
बे-ख़ुदी
से
जो
हम-कनार
नहीं
वो
ख़ुदी
आगही
नहीं
होती
आह
जो
अर्श
तक
पहुँच
न
सके
दिल
से
निकली
हुई
नहीं
होती
हुस्न
को
इश्क़
ही
ने
दी
है
कशिश
चाँद
में
रौशनी
नहीं
होती
बर्क़
भी
कौंदती
तो
है
लेकिन
उन
की
अंगड़ाई
सी
नहीं
होती
फूल
रोते
हैं
सारी
रात
'फहीम'
ओस
की
ये
तरी
नहीं
होती
- Faheem Amrohvi
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इतने
अफ़सुर्दा
नहीं
हैं
हम
कि
कर
लें
ख़ुद-कुशी
और
न
इतने
ख़ुश
कि
सच
में
मरने
की
ख़्वाहिश
न
हो
Charagh Sharma
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कुछ
इस
अदास
मोहब्बत-शनास
होना
है
ख़ुशी
के
बाब
में
मुझ
को
उदास
होना
है
Rahul Jha
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जो
बिस्मिल
बना
दे
वो
क़ातिल
तबस्सुम
जो
क़ातिल
बना
दे
वो
दिलकश
नज़ारा
मोहब्बत
का
भी
खेल
नाज़ुक
है
कितना
नज़र
मिल
गई
आप
जीते
मैं
हारा
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Nushur Wahidi
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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वो
बे-वफ़ा
है
तो
क्या
मत
कहो
बुरा
उसको
कि
जो
हुआ
सो
हुआ
ख़ुश
रखे
ख़ुदा
उसको
Naseer Turabi
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तू
अगर
ख़ुश
है
मेरे
रोने
में
मैं
वहाँ
बैठ
जाऊँ
कोने
में
देखते
हो
ये
ईंट
का
तकिया
एक
अर्सा
लगा
भिगोने
में
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Zahid Bashir
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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नाम
पे
हम
क़ुर्बान
थे
उस
के
लेकिन
फिर
ये
तौर
हुआ
उस
को
देख
के
रुक
जाना
भी
सब
से
बड़ी
क़ुर्बानी
थी
मुझ
से
बिछड़
कर
भी
वो
लड़की
कितनी
ख़ुश
ख़ुश
रहती
है
उस
लड़की
ने
मुझ
से
बिछड़
कर
मर
जाने
की
ठानी
थी
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Jaun Elia
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हल्की-हल्की
सी
हँसी,
साफ
इशारा
भी
नहीं
जान
भी
ले
गए
और,
जान
से
मारा
भी
नहीं
Sawan Shukla
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उसे
अभी
भी
मेरे
दिल
के
हाल
का
नहीं
पता
तो
यानी
उसको
अपने
घर
का
रास्ता
नहीं
पता
ये
तेरी
भूल
है
ऐ
मेरे
ख़ुश-ख़याल
के
मुझे
पराई
औरतों
से
तेरा
राब्ता
नहीं
पता
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Ruqayyah Maalik
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सोचता
हूँ
किधर
गए
हम
लोग
जी
रहे
हैं
कि
मर
गए
हम
लोग
रात
भर
एक
एक
जम्अ'
हुए
पौ
फटे
ही
बिखर
गए
हम
लोग
अपना
घर
ढूँडने
को
क्या
निकले
जाने
किस
किस
के
घर
गए
हम
लोग
ये
मकाँ
शहर
भाई
और
बहन
इन
हदों
से
गुज़र
गए
हम
लोग
दिल
कहीं
है
तो
दस्त-ओ-पा
हैं
कहीं
जिस्म
तक़्सीम
कर
गए
हम
लोग
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Faheem Amrohvi
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दिन
तो
जूँ-तूँ
चलो
गुज़र
जाए
निघरा
रात
में
किधर
जाए
ये
सड़क
पर
पड़ा
हुआ
इक
शख़्स
इस
के
सीने
से
कार
उतर
जाए
घर
से
पाँव
निकल
गया
उस
का
अब
ख़ुदा
जाने
वो
किधर
जाए
इस
ज़माने
में
ज़िंदगी
के
लिए
सोच
भी
ले
कोई
तो
मर
जाए
रात
की
फ़िक्र
तो
करूँँ
लेकिन
सर
से
ये
धूप
तो
उतर
जाए
आइना
मुँह
चिड़ा
रहा
है
मुझे
ख़ुद
को
जो
देख
ले
तो
डर
जाए
इंतिशार-ए-हयात
उफ़
जैसे
आईना
टूट
कर
बिखर
जाए
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Faheem Amrohvi
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हम
ने
बूढ़ों
से
ये
सुनी
है
मियाँ
बात
वो
है
जो
अन-कही
है
मियाँ
अपनी
साँसें
भी
अपने
बस
में
नहीं
ज़िंदगी
ख़ाक
ज़िंदगी
है
मियाँ
जिस
के
तन
पर
लिबास
तक
भी
नहीं
वो
भी
क्या
कोई
आदमी
है
मियाँ
मेरे
अल्फ़ाज़
लिख
के
तुम
रख
लो
अभी
आवाज़
दब
रही
है
मियाँ
तुम
नहीं
बोलते
तो
यूँँही
सही
हम
ने
भी
चुप
की
साध
ली
है
मियाँ
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Faheem Amrohvi
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तुम
जो
हो
पास
तो
कमी
क्या
है
तुम
न
हो
तो
ये
ज़िंदगी
क्या
है
गर्दिश-ए-वक़्त
ये
तो
बतला
दे
फूल
क्या
चीज़
है
कली
क्या
है
कोई
लम्हा
रुके
तो
मैं
पूछूँ
वक़्त
को
ऐसी
बेकली
क्या
है
एक
साँसों
के
सिलसिले
के
सिवा
हम
ग़रीबों
की
ज़िंदगी
क्या
है
बंद
कमरों
के
बासियों
से
न
पूछ
सुब्ह
क्या
शय
है
रौशनी
क्या
है
अक़्ल
मबहूत
हो
गई
फ़ौरन
जब
भी
सोचा
कि
ज़िंदगी
क्या
है
इन
चराग़ों
तले
अँधेरा
है
इन
चराग़ों
में
रौशनी
क्या
है
अद्ल
बहरा
है
गुंग
है
मज़लूम
कोई
किस
से
कहे
कोई
क्या
है
हाँ
नहीं
है
तो
बस
वफ़ा
वर्ना
मेरे
अहबाब
में
कमी
क्या
है
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बरसर-ए-रोज़गार
थे
पहले
हम
भी
यारों
के
यार
थे
पहले
आज
ये
ज़ीस्त
हम
पे
बार
सही
ज़ीस्त
पर
हम
भी
बार
थे
पहले
आज
हम
वक़्त
को
पुकारते
हैं
वक़्त
की
हम
पुकार
थे
पहले
आओ
अब
उन
की
छाँव
भी
ढूँडें
जो
शजर
साया-दार
थे
पहले
गो
कि
ख़ुशियाँ
हैं
बे-शुमार
मगर
ग़म
बहुत
ख़ुश-गवार
थे
पहले
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