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Faheem Amrohvi
barsar-e-rozgaar the pahle
barsar-e-rozgaar the pahle | बरसर-ए-रोज़गार थे पहले
- Faheem Amrohvi
बरसर-ए-रोज़गार
थे
पहले
हम
भी
यारों
के
यार
थे
पहले
आज
ये
ज़ीस्त
हम
पे
बार
सही
ज़ीस्त
पर
हम
भी
बार
थे
पहले
आज
हम
वक़्त
को
पुकारते
हैं
वक़्त
की
हम
पुकार
थे
पहले
आओ
अब
उन
की
छाँव
भी
ढूँडें
जो
शजर
साया-दार
थे
पहले
गो
कि
ख़ुशियाँ
हैं
बे-शुमार
मगर
ग़म
बहुत
ख़ुश-गवार
थे
पहले
- Faheem Amrohvi
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कल
रात
बहुत
ग़ौर
किया
है
सो
हम
उसकी
तय
करके
उठे
हैं
कि
तमन्ना
ना
करेंगे
इस
बार
वो
तल्ख़ी
है
की
रूठे
भी
नहीं
हम
अबके
वो
लड़ाई
है
के
झगड़ा
ना
करेंगे
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Jaun Elia
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गले
में
उस
के
ख़ुदा
की
अजीब
बरकत
है
वो
बोलता
है
तो
इक
रौशनी
सी
होती
है
Bashir Badr
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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उस
ने
फेंका
मुझ
पे
पत्थर
और
मैं
पानी
की
तरह
और
ऊँचा
और
ऊँचा
और
ऊँचा
हो
गया
Kunwar Bechain
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सीने
लगाऊँ
ग़ैर
को
तो
पूछता
है
दिल
किसकी
जगह
थी
और
ये
सीने
पे
कौन
है
Ankit Maurya
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चारा-गर
तो
तभी
बचा
पाएँगे
ना
चारा-गर
की
जान
बचाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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इतना
आसान
नहीं
होता
है
शायर
कहलाना
दर्दों
को
कहने
से
पहले
सहना
भी
पड़ता
है
Harsh saxena
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रहबर
भी
ये
हमदम
भी
ये
ग़म-ख़्वार
हमारे
उस्ताद
ये
क़ौमों
के
हैं
में'मार
हमारे
Unknown
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इश्क़
हुआ
है
क्या
तुझ
को
भी
तेरा
जो
होगा
सो
होगा
shaan manral
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कब
लौटा
है
बहता
पानी
बिछड़ा
साजन
रूठा
दोस्त
हम
ने
उस
को
अपना
जाना
जब
तक
हाथ
में
दामाँ
था
Ibn E Insha
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सोचता
हूँ
किधर
गए
हम
लोग
जी
रहे
हैं
कि
मर
गए
हम
लोग
रात
भर
एक
एक
जम्अ'
हुए
पौ
फटे
ही
बिखर
गए
हम
लोग
अपना
घर
ढूँडने
को
क्या
निकले
जाने
किस
किस
के
घर
गए
हम
लोग
ये
मकाँ
शहर
भाई
और
बहन
इन
हदों
से
गुज़र
गए
हम
लोग
दिल
कहीं
है
तो
दस्त-ओ-पा
हैं
कहीं
जिस्म
तक़्सीम
कर
गए
हम
लोग
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रात
कटी
है
रोते
रोते
ग़म
का
बोझा
ढोते
ढोते
ज़ख़्मों
की
सौग़ात
मिली
है
दाग़-ए-पिन्हाँ
धोते
धोते
घर
पिछवारे
कैसा
ग़ुल
है
जाग
न
जाऊँ
सोते
सोते
अहद-ए-जवानी
भारी
पत्थर
थक
जाऊँगा
ढोते
ढोते
ये
भी
वक़्त
का
धोका
समझो
कोई
हँसे
जो
रोते
रोते
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Faheem Amrohvi
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दिन
तो
जूँ-तूँ
चलो
गुज़र
जाए
निघरा
रात
में
किधर
जाए
ये
सड़क
पर
पड़ा
हुआ
इक
शख़्स
इस
के
सीने
से
कार
उतर
जाए
घर
से
पाँव
निकल
गया
उस
का
अब
ख़ुदा
जाने
वो
किधर
जाए
इस
ज़माने
में
ज़िंदगी
के
लिए
सोच
भी
ले
कोई
तो
मर
जाए
रात
की
फ़िक्र
तो
करूँँ
लेकिन
सर
से
ये
धूप
तो
उतर
जाए
आइना
मुँह
चिड़ा
रहा
है
मुझे
ख़ुद
को
जो
देख
ले
तो
डर
जाए
इंतिशार-ए-हयात
उफ़
जैसे
आईना
टूट
कर
बिखर
जाए
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Faheem Amrohvi
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हम
ने
बूढ़ों
से
ये
सुनी
है
मियाँ
बात
वो
है
जो
अन-कही
है
मियाँ
अपनी
साँसें
भी
अपने
बस
में
नहीं
ज़िंदगी
ख़ाक
ज़िंदगी
है
मियाँ
जिस
के
तन
पर
लिबास
तक
भी
नहीं
वो
भी
क्या
कोई
आदमी
है
मियाँ
मेरे
अल्फ़ाज़
लिख
के
तुम
रख
लो
अभी
आवाज़
दब
रही
है
मियाँ
तुम
नहीं
बोलते
तो
यूँँही
सही
हम
ने
भी
चुप
की
साध
ली
है
मियाँ
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Faheem Amrohvi
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ग़म
की
गर
चाशनी
नहीं
होती
ज़िंदगी
ज़िंदगी
नहीं
होती
रूठ
जाना
तो
ख़ैर
आसाँ
है
पर
मनाना
हँसी
नहीं
होती
उन
के
पीछे
तो
है
उन्हीं
का
ज़िक्र
सामने
बात
भी
नहीं
होती
दिल
लगा
कर
समझ
में
आया
है
ये
कोई
दिल-लगी
नहीं
होती
बे-ख़ुदी
से
जो
हम-कनार
नहीं
वो
ख़ुदी
आगही
नहीं
होती
आह
जो
अर्श
तक
पहुँच
न
सके
दिल
से
निकली
हुई
नहीं
होती
हुस्न
को
इश्क़
ही
ने
दी
है
कशिश
चाँद
में
रौशनी
नहीं
होती
बर्क़
भी
कौंदती
तो
है
लेकिन
उन
की
अंगड़ाई
सी
नहीं
होती
फूल
रोते
हैं
सारी
रात
'फहीम'
ओस
की
ये
तरी
नहीं
होती
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Faheem Amrohvi
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