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Faheem Amrohvi
ham ne boodhon se ye sooni hai miyaan
ham ne boodhon se ye sooni hai miyaan | हम ने बूढ़ों से ये सुनी है मियाँ
- Faheem Amrohvi
हम
ने
बूढ़ों
से
ये
सुनी
है
मियाँ
बात
वो
है
जो
अन-कही
है
मियाँ
अपनी
साँसें
भी
अपने
बस
में
नहीं
ज़िंदगी
ख़ाक
ज़िंदगी
है
मियाँ
जिस
के
तन
पर
लिबास
तक
भी
नहीं
वो
भी
क्या
कोई
आदमी
है
मियाँ
मेरे
अल्फ़ाज़
लिख
के
तुम
रख
लो
अभी
आवाज़
दब
रही
है
मियाँ
तुम
नहीं
बोलते
तो
यूँँही
सही
हम
ने
भी
चुप
की
साध
ली
है
मियाँ
- Faheem Amrohvi
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संग-ए-मरमर
की
मूरत
नहीं
आदमी
इस
क़दर
ख़ूब-सूरत
नहीं
आदमी
चंद
क़िस्सों
की
दरकार
है
बस
इसे
आदमी
की
ज़रूरत
नहीं
आदमी
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anupam shah
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ख़ूब-सूरत
है
सिर्फ़
बाहरस
ये
इमारत
भी
आदमी
सी
है
Azhar Nawaz
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ऐ
आसमान
तेरे
ख़ुदा
का
नहीं
है
ख़ौफ़
डरते
हैं
ऐ
ज़मीन
तेरे
आदमी
से
हम
Unknown
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बस
एक
मैं
था
जिस
सेे
सच
मुच
में
दिलबरी
की
वरना
हर
आदमी
से
उसने
दो
नंबरी
की
जिस
बात
में
भी
हमने
ख़ुद
को
अकेला
रक्खा
बाग़ात
में
भी
हमने
जोड़ों
की
मुख़बरी
की
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Muzdum Khan
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मोहब्बत
एक
ख़ुशबू
है
हमेशा
साथ
चलती
है
कोई
इंसान
तन्हाई
में
भी
तन्हा
नहीं
रहता
Bashir Badr
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इश्क़
में
कहते
हो
हैरान
हुए
जाते
हैं
ये
नहीं
कहते
कि
इंसान
हुए
जाते
हैं
Josh Malihabadi
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कभी
हँस
के
कभी
रो
के
मिलूँगा
मैं
मैं
भी
इंसान
हूँ
ऐसे
मिलूँगा
मैं
मुझे
सब
की
मोहब्बत
चाहिए
वरना
मरीज़े
ज़र्द
के
जैसे
मिलूँगा
मैं
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Meem Alif Shaz
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ठहाका
मार
कर
हथियार
हँसते
नहीं
जीतेंगे
अब
इंसान
हम
सेे
Umesh Maurya
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आने
वाले
जाने
वाले
हर
ज़माने
के
लिए
आदमी
मज़दूर
है
राहें
बनाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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बस्ती
में
अपनी
हिन्दू
मुसलमाँ
जो
बस
गए
इंसाँ
की
शक्ल
देखने
को
हम
तरस
गए
Kaifi Azmi
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बरसर-ए-रोज़गार
थे
पहले
हम
भी
यारों
के
यार
थे
पहले
आज
ये
ज़ीस्त
हम
पे
बार
सही
ज़ीस्त
पर
हम
भी
बार
थे
पहले
आज
हम
वक़्त
को
पुकारते
हैं
वक़्त
की
हम
पुकार
थे
पहले
आओ
अब
उन
की
छाँव
भी
ढूँडें
जो
शजर
साया-दार
थे
पहले
गो
कि
ख़ुशियाँ
हैं
बे-शुमार
मगर
ग़म
बहुत
ख़ुश-गवार
थे
पहले
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Faheem Amrohvi
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रात
कटी
है
रोते
रोते
ग़म
का
बोझा
ढोते
ढोते
ज़ख़्मों
की
सौग़ात
मिली
है
दाग़-ए-पिन्हाँ
धोते
धोते
घर
पिछवारे
कैसा
ग़ुल
है
जाग
न
जाऊँ
सोते
सोते
अहद-ए-जवानी
भारी
पत्थर
थक
जाऊँगा
ढोते
ढोते
ये
भी
वक़्त
का
धोका
समझो
कोई
हँसे
जो
रोते
रोते
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Faheem Amrohvi
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दिन
तो
जूँ-तूँ
चलो
गुज़र
जाए
निघरा
रात
में
किधर
जाए
ये
सड़क
पर
पड़ा
हुआ
इक
शख़्स
इस
के
सीने
से
कार
उतर
जाए
घर
से
पाँव
निकल
गया
उस
का
अब
ख़ुदा
जाने
वो
किधर
जाए
इस
ज़माने
में
ज़िंदगी
के
लिए
सोच
भी
ले
कोई
तो
मर
जाए
रात
की
फ़िक्र
तो
करूँँ
लेकिन
सर
से
ये
धूप
तो
उतर
जाए
आइना
मुँह
चिड़ा
रहा
है
मुझे
ख़ुद
को
जो
देख
ले
तो
डर
जाए
इंतिशार-ए-हयात
उफ़
जैसे
आईना
टूट
कर
बिखर
जाए
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Faheem Amrohvi
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सोचता
हूँ
किधर
गए
हम
लोग
जी
रहे
हैं
कि
मर
गए
हम
लोग
रात
भर
एक
एक
जम्अ'
हुए
पौ
फटे
ही
बिखर
गए
हम
लोग
अपना
घर
ढूँडने
को
क्या
निकले
जाने
किस
किस
के
घर
गए
हम
लोग
ये
मकाँ
शहर
भाई
और
बहन
इन
हदों
से
गुज़र
गए
हम
लोग
दिल
कहीं
है
तो
दस्त-ओ-पा
हैं
कहीं
जिस्म
तक़्सीम
कर
गए
हम
लोग
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Faheem Amrohvi
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ग़म
की
गर
चाशनी
नहीं
होती
ज़िंदगी
ज़िंदगी
नहीं
होती
रूठ
जाना
तो
ख़ैर
आसाँ
है
पर
मनाना
हँसी
नहीं
होती
उन
के
पीछे
तो
है
उन्हीं
का
ज़िक्र
सामने
बात
भी
नहीं
होती
दिल
लगा
कर
समझ
में
आया
है
ये
कोई
दिल-लगी
नहीं
होती
बे-ख़ुदी
से
जो
हम-कनार
नहीं
वो
ख़ुदी
आगही
नहीं
होती
आह
जो
अर्श
तक
पहुँच
न
सके
दिल
से
निकली
हुई
नहीं
होती
हुस्न
को
इश्क़
ही
ने
दी
है
कशिश
चाँद
में
रौशनी
नहीं
होती
बर्क़
भी
कौंदती
तो
है
लेकिन
उन
की
अंगड़ाई
सी
नहीं
होती
फूल
रोते
हैं
सारी
रात
'फहीम'
ओस
की
ये
तरी
नहीं
होती
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Faheem Amrohvi
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